विनयी भक्त ही कृपा का पात्र

Yashwant Vyas Updated Fri, 08 Jun 2012 12:00 PM IST
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अपने को अहंकार से सर्वथा मुक्त कर विनयशील होकर प्रार्थना करने वाला सहज ही भगवान की कृपा प्राप्त करने में सफल हो जाता है।
पद्मपुराण में कहा गया है कि बड़े-बड़े साधक तपस्या से जो प्राप्त नहीं कर पाते, उसे विनीत भाव से स्वयं को दीन-हीन मानकर प्रार्थना करने वाला प्राप्त कर लेता है। एक भगवत प्रेमी की कातर प्रार्थना का अंश पद्मपुराण में दिया गया है, जनार्दन, यह संसार अत्यंत गहरा है, इसको पार कर पाना कठिन है। यह दुख भरी लहरों और मोहमयी तरंगों से भरा है। मैं अत्यंत दीन हूं और अपने ही गुण-दोषों के कारण इसमें फंसा हूं।अतः आप मेरा उद्धार कीजिए।

भक्त आगे कहता है, कर्मरूपी बादलों की गहरी घटा घिरी हुई है, जो गरजती-बरसती रहती है। मेरे पातकों की राशि विद्युल्लता की भांति उसमें थिरक रही है। मोहरूपी अंधकार से मेरी दृष्टि और विवेक शक्ति नष्ट हो गई है। मैं अत्यंत दीन हो रहा हूं, मधुसूदन। मुझे अपने हाथों का सहारा दीजिए। प्रेमी भक्त अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए कहता है, यह संसार एक सघन वन है। इसमें असंख्य दुःख-वृक्ष हैं। मोहरूपी सिंह इसमें निर्भय विचरण करते हैं। मुझे बचाइए।

पुराणकार कहते हैं कि जो साधक हर तरह का अहंकार त्यागकर, मोह-माया के प्रपंच से दूर रहकर, अपनी कातर पुकार प्रार्थना के रूप में भगवान तक पहुंचाते हैं, उसके उद्धार में भगवान एक क्षण का भी विलंब नहीं करते।

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