पालन-पोषण करने वाली शक्ति

Yashwant Vyas Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
यह जानते हुए भी कि मानव जीवन का एक-एक पल अमूल्य है, उसे भक्ति, सेवा और परोपकार में लगाने में ही सार्थकता है, मनुष्य अपने पारिवारिक कार्यों में ही लगा रहता है। वह सोचता है कि यदि धर्मशास्त्रों के अनुसार साठ वर्ष के बाद गृहस्थी त्यागकर चले गए, तो परिवार के लोगों का भरण-पोषण कैसे हो पाएगा?

एक विद्वान एवं सद्गृहस्थ संत थे श्रीधर स्वामी। वह अपना सारा समय भक्ति एवं अध्ययन में लगाते थे। उन्होंने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन कर धर्मशास्त्रों की टीका लिखी। एक धर्माचार्य उनसे इतने प्रभावित हुए कि सांसारिक प्रपंच त्यागकर उन्हें एकांत साधना करने की सलाह दे दी, ताकि उनके साथ-साथ दूसरों का भी कल्याण हो सके। उन्होंने सहज भाव से उत्तर दिया, महाराज, मेरे घर छोड़ देने के बाद मेरे पौत्र-पौत्रियों एवं अन्य परिजनों का काम कैसे चलेगा? वे थोड़ा लायक बन जाएं, तो मैं घर छोड़ दूंगा।

श्रीधर आचार्य एक दिन पक्षी के एक छोटे से बच्चे को देखकर सोचने लगे कि इस छोटे से पक्षी के बच्चे की भूख कैसे मिटेगी! तभी अचानक एक चिड़िया वहां पहुंची और बच्चे के मुंह में अपनी चोंच से दाना डाल दिया। आचार्य को तुरंत एहसास हुआ कि जब इस पक्षी के बच्चे के पालन-पोषण की व्यवस्था कोई शक्ति करने को तत्पर है, तो क्या उनके परिजनों का पालन-पोषण नहीं हो सकेगा। उन्होंने उसी दिन घर त्याग दिया और अपना शेष जीवन साधना में लगा दिया।

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