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सच्चे भक्त की पहचान

Yashwant Vyas Updated Wed, 06 Jun 2012 12:00 PM IST
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धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि निष्कपट व्यवहार करने वाले और प्राणी मात्र से प्रेम करने वाले ही सच्चे भक्त कहलाने के अधिकारी हैं। परम विरक्त संत ब्रह्मलीन रामचंद्र केशव डोंगरे जी के पास एक सत्संगप्रिय धनाढ्य व्यक्ति पहुंचा और उनसे कहा, महाराज, हमको ऐसा मंत्र दीजिए, जिससे हम मुकदमे में जीत जाएं।
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संत जी ने पूछा, किसके ऊपर मुकदमा किया है? उसने बताया, जायदाद को लेकर अपने भाई पर मुकदमा किया है। संत जी ने कहा, तुम रामायण के प्रति प्रेम दर्शाया करते हो। क्या उसमें भरत और लक्ष्मण का चरित्र नहीं पढ़ा? भरत को अयोध्या का राज मिला, किंतु उन्होंने यह कहकर उसे ठुकरा दिया कि इसके अधिकारी तो भ्राता राम हैं। तुम भक्ति का स्वांग करते हो। भगवान तो प्रत्यक्ष दिखते नहीं। मूर्ति में भगवान की भावना करनी पड़ती है, किंतु भाई तो प्रत्यक्ष दिखता है। जिसे भाई में भगवान नहीं दिखता, वह भला भक्ति क्या करेगा!


कुछ क्षण रुककर डोंगरे जी ने कहा, जिन्हें घर में रहकर भक्ति करनी है, उन्हें घर के प्रत्येक व्यक्ति में अपने समान आत्मा के दर्शन करने चाहिए। किसी को दुख पहुंचे, ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए। घर के किसी सदस्य को दुख न पहुंचाने का संकल्प लेने वाला व्यक्ति ही घर में रहकर भी मुक्ति पा सकता है। जो दूसरों की खुशी में सुख खोजता है, वास्तव में वही सच्चा भक्त है। जो दूसरों को सुख बांटता है, ऐसा व्यक्ति भगवान को बहुत प्रिय होता है।

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