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एक ऋषि की विनयशीलता

Yashwant Vyas Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
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एक पौराणिक कथा है। एक पवित्र तीर्थ क्षेत्र में एक भील रहता था। उसने ऐसी सिद्धि प्राप्त की कि जब वह किसी वृक्ष को नमन करता, तो वह वृक्ष झुककर उसे फल प्रदान करता। उस भील ने अपने पुत्र को भी यह मंत्र बता दिया था। एक दिन एक ऋषि जंगल से गुजर रहे थे। उन्होंने भील को ऐसा करते देखा, तो हतप्रभ रह गए। उन्होंने भील को आवाज लगाई। भील ऋषि के सामने खड़ा न हो सका, और अपनी झोंपड़ी में जा घुसा। ऋषि भी वहां जा पहुंचे। भील पिछले दरवाजे से गायब हो गया। भील के पुत्र ने ऋषि को आदरपूर्वक बिठाया और पूछा, महाराज, पिताजी से क्या काम है? ऋषि ने बताया, मैं उनसे वृक्ष नमन मंत्र लेना चाहता हूं। चूंकि पुत्र भी मंत्र जानता था, इसलिए उसने ऋषि को वह मंत्र बता दिया।


ऋषि के जाने के बाद जब भील लौटा, तो पुत्र ने उसे पूरी कहानी बताई। भील ने कहा, यह तूने धर्म विरुद्ध कार्य किया है। भील पुत्र होते हुए भी तूने एक ऋषि को मंत्र दिया। वह अपने पुत्र को लेकर ऋषि के आश्रम में पहुंचा। ऋषि ने अपने से ऊंचे आसन पर उनसे बैठने का आग्रह किया। भील ने कहा, आप ऋषि हैं, और हम तुच्छ भील। आपसे ऊंचे आसन पर हम कैसे बैठ सकते हैं। ऋषि बोले, शास्त्रों में कहा गया है कि जिससे कुछ सीखा जाता है, वह गुरु के समान आदर योग्य होता है। मैंने आपसे वृक्ष नमन मंत्र सीखा है, इसलिए आप मेरे गुरु समान हुए। भील और उनका पुत्र ऋषि की विनम्रता देखकर हतप्रभ रह गए।

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