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धैर्य के साथ बुरे समय का सामना

Yashwant Vyas Updated Tue, 29 May 2012 12:00 PM IST
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महाभारत के शांतिपर्व की कथा है। भगवान विष्णु ने पृथ्वी तथा स्वर्ग का राज्य बलि से लेकर इंद्र को दे दिया था। राज-लक्ष्मी के अहंकार से ग्रस्त इंद्र की बुद्धि भ्रष्ट हो गई। उन्होंने सोचा कि कहीं बलि पुनः तपस्या के बल पर अपना राज्य वापस लेने में सफल न हो जाए। इसलिए वह बलि की हत्या के उद्देश्य से उसके पास पहुंचे। इंद्र ने बलि से कहा, दानवराज, मैं तुम्हारी दीनता-हीनता को देखकर बहुत दुखी हूं। तुम्हारी ख्याति अग्रणी दानी के रूप में सभी लोकों में थी। क्या अपनी दीन-हीन दशा से तुम्हें दुख नहीं हो रहा?
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बलि ने जवाब दिया, देवराज, आप अपनी दयनीय स्थिति को क्यों भुला बैठे हैं? मैं अच्छी तरह जानता हूं कि समय आने पर काल सबको नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति अहंकार के वशीभूत होकर धर्म विरुद्ध कार्य कर बैठते हैं, उनका पतन कोई नहीं रोक सकता। जो धैर्य के साथ बुरे समय को बिता देता है, उसे पुनः यश की प्राप्ति होती है।

विद्वानों ने काल को 'दुरतिक्रम' और 'परमेश्वर' कहा है। बड़े वेग से दौड़ने पर भी कोई मनुष्य काल को नहीं लांघ सकता। हम सब उसी के अधीन हैं। जो राज-लक्ष्मी मेरे पास थी, वह आज आपके पास है, पर यह कब आपका साथ छोड़कर निकल जाएगी, कहा नहीं जा सकता। इसलिए मैं धैर्य के साथ अपने बुरे दिन बिता रहा हूं। बलि के अनूठे धैर्य को देखकर इंद्र हतप्रभ हो उठे। वह उन्हें प्रणाम कर वापस लौट आए।

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