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उषा के भीतर से अगोचर का दर्शन

Yashwant Vyas Updated Mon, 28 May 2012 12:00 PM IST
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सूर्योदय से पूर्व प्रकाशमान आभा को उषा कहा गया है। उषाकाल का महत्व पुराण, उपनिषदों तथा आयुर्वेद में भी प्रतिपादित किया गया है। ऋग्वेद में उषा की ऋचा में कहा गया है, यह वह उषा है, जिसके भीतर से अगोचर का दर्शन होता है। यह मनुष्य को जगाती है, और उसके यात्रा-पंथों को सुगम बनाती है। यह मार्गदर्शन करती है। कितना विशाल और दिव्य है इसका रथ, कितनी विराट और सर्वव्यापी है यह देवी! कैसे यह दिनों के सम्मुख नित नूतन प्रकाश लाती है। कैसे यह अपनी श्वेत आभा में अविर्भूत होती है और हमारे सम्मुख अमृत राशि बिखेरती चलती है।
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ऋषिगण स्तुतिगान करते हैं, अरे देखो तो, कितनी जाज्वल्यमान है इसकी देह। यह प्रकाश में नहाती हुई ऊंचाइयों में खड़ी रहती है कि हम अगोचर का प्रकट दर्शन कर सकें। सारे अंधकारों को दूर भगाती हुई, दिवो दुहिता उसा, ज्योति लेकर आई है। अरे देखो तो, स्वर्ग की बेटी उषा, सुख सोहाग भरी रमणी-सी देवताओं से मिलने के लिए अग्रसर हो रही है, और इसका स्वरूप बराबर उनके निकट से निकटतर पहुंच रहा है। इस देवी ने एक बार फिर से उसी प्रकाश को जन्म दिया है, जिसे उसने सृष्टि के आदिकाल में प्रकट किया था।

आयुर्वेदशास्त्र में कहा गया है, जो उषा काल में सोता रहता है, वह अपने भविष्य को अंधकार में समाहित करने का दुष्प्रयास करता है। ऋषियों ने उषाकाल को आत्मज्ञान प्राप्ति का उत्तम समय माना है।

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