विकारों को रुई के समान जलाओ

Yashwant Vyas Updated Wed, 16 May 2012 12:00 PM IST
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एक राजकुमार संतों के पास जाकर पूछा करता था कि क्या आत्मज्ञान प्राप्त करने का कोई सरल साधन है। कोई संत उसे इंद्रियों पर संयम रखने को कहते, तो कुछ योग साधना का सुझाव देते। एक दिन जब वह किसी संत के आश्रम से लौट रहा था, तो रास्ते में उसने ऊंटों का काफिला देखा, जिनकी पीठ पर गट्ठर लदे हुए थे।
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रुई के इन गठ्ठरों को देखकर वह सोचने लगा कि इतनी भारी रुई को कौन धुनेगा, कौन कातेगा? अब वह आत्मज्ञान की बात छोड़कर यह गुनगुनाने लगा कि इतनी सारी रुई कौन धुनेगा, कौन कातेगा, कौन बुनेगा। राजा उसकी इस सनक को देखकर चिंतित हो उठा। उसने बड़े-से-बड़े वैद्यों से उपचार कराया, पर राजकुमार की सनक दूर नहीं हो सकी।
एक संत राज्य में आ पहुंचे। उन्हें राजा ने बताया कि राजकुमार ने आत्मज्ञान की रट छोड़कर रुई की रट लगाई हुई है। संत ने राजा से कहा, राजकुमार को मेरे सामने बुलवाएं। राजकुमार ने संत जी के सामने भी रुई को धुनने, कातने और बुनने की चिंता व्यक्त की। संत ने कहा, राजकुमार, रुई के गोदाम में आग लगने के कारण वह तमाम रुई तो मेरे सामने ही जलकर राख हो गई। राजकुमार ने यह सुना, तो चैन की सांस ली।
संत बोले, राजकुमार आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए तमाम विकारों को रुई की तरह जला डालो। आत्मज्ञान प्राप्त हो जाएगा। संत के उपदेश से राजकुमार की आंखें खुल गईं और वह उनका शिष्य बन गया।
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