मध्यमार्ग ही कल्याणकारी है

Yashwant Vyas Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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राजकुमार श्रोण हर समय भोग-विलास में लीन रहता था। उसने बुद्ध का प्रवचन सुना, तो उसे लगा कि वह अपना जीवन व्यर्थ गवां रहा है। भोग-विलास तो क्षणिक सुख देता है, स्थायी शांति नहीं। वह सब कुछ त्यागकर बुद्ध के पास पहुंचा और भिक्षु बन गया। लेकिन उस पर तपस्या का भूत इस कदर सवार हुआ कि उसने एक समय भोजन करना शुरू किया और पत्थर-कांटों पर चलकर शरीर को कष्ट देने लगा। इस वजह से जल्दी ही उसका शरीर सूखकर कांटा हो गया।
बुद्ध को यह पता चला, तो वह चिंतित हो उठे। उन्हें पता था कि राजकुमार श्रोण अच्छा वीणा वादक है। एक दिन वह उसके पास पहुंचे और पूछा, श्रोण तुम वीणा बजाने में बहुत अभ्यस्थ थे। यह बताओ कि यदि वीणा के तार बहुत ढीले हों, तो क्या संगीत पैदा होगा? श्रोण ने बताया कि ज्यादा ढीले तारों से संगीत ध्वनि पैदा ही नहीं होगी। दूसरा प्रश्न बुद्ध ने पूछा, और यदि तार ज्यादा कसे हों, तो...? श्रोण ने बताया, इससे तार टूट जाएंगे। इसलिए संगीत के लिए तार मध्य में होने चाहिएं।

बुद्ध ने तब श्रोण को समझाया, ठीक यही युक्ति योग-साधना के लिए भी उपयुक्त होती है। अति भोग जहां जीवन को निरर्थक कर देता है, वहीं तप के नाम पर शरीर को अत्यधिक दुख देना भी घातक है। बीच का मार्ग अपनाकर ही सफलता मिल सकती है। यह सुनकर श्रोण का भ्रम दूर हो गया और वह भी मध्यम मार्ग पर चलकर निर्वाण के पथ पर बढ़ चला।

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