पिशाच के समान होता है मन

Yashwant Vyas Updated Fri, 11 May 2012 12:00 PM IST
नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि प्रत्येक क्षण किसी न किसी सत्कार्य में व्यस्त रहना चाहिए। ऋषिकेश के ब्रह्मलीन संत स्वामी शिवानंद सरस्वती कहा करते थे कि मन एक पिशाच के समान है, जो अशांत रहता है। कोई काम न हो, तो स्वाध्याय करने में व्यस्त रहना चाहिए। राम नाम जपकर मन को एकाग्र किया जा सकता है।

स्वामी शिवानंद जी कहानी सुनाया करते थे। एक पंडित ने मंत्र सिद्धि के बल पर एक पिशाच को वश में कर लिया। पिशाच ने पंडित से कहा, मुझमें अलौकिक सिद्धियां हैं। मैं पल भर में कोई भी काम कर सकता हूं। मुझे विविध प्रकार के कार्य देते रहना होगा। बिना किसी काम के एक क्षण भी छोड़ा, तो मैं आपका भक्षण कर लूंगा। पंडित सहमत हो गया। पंडित ने जो-जो कार्य बताए, पिशाच ने पलक क्षपकते ही कर दिया। कुछ ही समय में पंडित के सारे कार्य हो गए। अब उसके पास कोई ऐसा काम ही नहीं बचा, जिसे वह पिशाच को करने के लिए दे सके। मृत्यु का डर होते ही वह भागा-भागा अपने गुरु के पास पहुंचा और सारी कहानी बताई।

गुर हंसे और बोले, इस समस्या का हल बुद्धि से ही निकल सकता है। ऐसा करो कि पिशाच से कहकर आंगन में एक काष्ठ-स्तंभ खड़ा करवा दो। तैयार होते ही उस पर पिशाच को ऊपर-नीचे आने-जाने के लिए कहना और साथ ही कहना कि वह राम नाम का उच्चारण अहर्निश करता रहे। पंडित ने वैसा ही किया। इस युक्ति से पिशाच वश में हो गया और राम नाम से उसका कल्याण भी हो गया।

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