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पूर्ण समर्पण का महत्व

Yashwant Vyas Updated Thu, 10 May 2012 12:00 PM IST
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श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश में पूर्ण समर्पण का महत्व बताते हुए कहते हैं, जो करो अपने लिए न करो। दूसरों के लिए करो। कर्तव्य का अभिमान मन में लेकर न करो। अपने लिए करोगे, तो कर्मफल के हेतु बनोगे और फंस जाओगे। 'मैं करता हूं', यह अभिमान लेकर करोगे, तो बंध जाओगे।
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कुछ क्षण रुककर वह फिर कहते हैं, सखे अर्जुन, अहमात्मा गुणकेश सर्वभूताशयस्थितः। मैं ही सबके भीतर आत्मा रूप में स्थिर हूं। इसलिए मैं कहता हूं कि मुझे सब कुछ अर्पित कर तुम सब तरह के संशयों से स्वतः मुक्ति पा जाओगे।


गीता मर्मज्ञ स्वामी रामसुखदास जी उपदेश में कहा करते थे, भोजन भूख मिटाने या स्वाद के लिए न करो। ईश्वर को प्रसाद के रूप में अर्पित करने के लिए भोजन करो। सांसारिक साधनों की प्राप्ति के लिए यज्ञ-होम न करो, बल्कि देवी-देवताओं की उपासना के उद्देश्य से करो। यदि किसी को दान दो, तो नाम, ख्याति या लौकिक कामना के लिए नहीं, बल्कि धन को लक्ष्मी माता का धरोहर मानकर उसका इस्तेमाल सेवा-परोपकार जैसे कार्यों में कर्तव्य के रूप में करो।

संत डोंगरे जी कहा करते थे, यह धन मेरा है, यह परिवार मेरा है, इस संकुचित भावना के कारण अहंकार पनपता है। बाप-बेटे के बीच कलह पैदा होती है। इसलिए इससे बचना चाहिए। जो 'सब कुछ परमात्मा का है' के तत्व को स्वीकार करता है, वह हर तरह के दुखों से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।

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