संत की अनूठी क्षमाशीलता

Yashwant Vyas Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
मुनि शुभनय ने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन कर यह संकल्प लिया था कि वह हमेशा दूसरों के कल्याण के लिए तत्पर रहेंगे। कभी किसी के प्रति न क्रोध करेंगे, न प्रतिशोध की भावना मन में आने देंगे। दर्शन के लिए आने वाले को उपदेश में वह कहा करते थे, हिंसा और पाप से हमेशा बचे रहना। सभी के प्रति मन में दया भाव रखने वाले पर ही ईश्वर दया करते हैं।
एक बार कुछ लुटेरों ने राजमहल से सोना चुराकर मुनि की कुटिया के सामने जमीन में दबा दिया। लेकिन अगली रात उनमें से ही किसी एक ने तमाम सोना हड़पने के लिए चुपचाप वहां से सोना निकाल लिया। कुछ दिन बाद गिरोह के सदस्य जब सोना लेने पहुंचे, तो जमीन खोदने पर सोना नहीं मिला। चोरों ने मुनि से पूछा, क्या आपने किसी को जमीन खोदते देखा था? मुनि साधना में लीन रहे। चोरों ने क्रोध में आकर मुनि पर हमला कर दिया और तलवार से उनका हाथ काट दिया।

कुछ दिन बाद सभी चोर पकड़े गए। उन्होंने राजा के सामने चोरी सहित मुनि का हाथ काटने वाला अपराध भी स्वीकार कर लिया। राजा ने आदेश दिया कि एक महान मुनि का हाथ काटने वाले इन खूंखार चोरों को मुनि के सामने ही फांसी पर लटका दिया जाए। चोरों को जब कुटिया के सामने लाया गया, तो मुनि ने राजा से कहा, ये कुसंगति के कारण अपराधी बने हैं। इन्हें क्षमा कर अच्छा बनने का अवसर दें। राजा सहित तमाम लोग मुनि की क्षमा भावना देखकर दंग रह गए।

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