रवींद्रनाथ ठाकुर का दर्शन

Yashwant Vyas Updated Mon, 07 May 2012 12:00 PM IST
कवि श्रेष्ठ रवींद्रनाथ ठाकुर से एक जिज्ञासु ने पूछा, कविवर, आपने कई देशों का भ्रमण किया है। विभिन्न दर्शन एवं शास्त्रों का अध्ययन किया है। अन्य देशों के दर्शन और भारतीय दर्शन में आपको क्या अंतर दिखाई देता है? श्री ठाकुर ने बताया, पश्चिमी देशों में शारीरिक सुख और भौतिक सुविधाओं को ही महत्व दिया जाता है, जबकि भारतीय दर्शन आत्मज्ञान को प्रमुख तत्व मानने के कारण मानवीय मूल्यों का विस्तारक है।

रवींद्र बाबू ने अपनी एक कविता का शीर्षक मातृ-अभिषेक रखा था, बाद में उन्होंने उसका नाम बदलकर भारत तीर्थ कर दिया। उन्होंने लिखा है, देश कहने का तात्पर्य केवल यहां की मिट्टी से नहीं है, बल्कि मानवीय चरित्रों से है। भारत ऐसा देश है, जहां मानवीय चरित्र का गठन दर्शन व संस्कृति से मिली चेतना से होता है।

गुरुदेव मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठावान थे। वह 1919 में अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग नरसंहार को देखकर इतने उद्वेलित हो उठे कि उन्होंने सम्राट जार्ज पंचम द्वारा दी गई 'नाइटहुड' की उपाधि का त्याग कर दिया था। एक कविता के माध्यम से श्री ठाकुर प्रभु से पूछ बैठे, जाहारा तोमार विषाइछे वायु, निभाइछे तब आलो, तुमि कि तादेर क्षमा करियाछो, तुमि कि बेशोछो भालो- यानी, हे प्रभु, जो तुम्हारी वायु को विषाक्त बना रहे हैं, तुम्हारे प्रकाश को बुझा रहे हैं, तुमने क्या उनको क्षमा कर दिया है? रवींद्रनाथ ठाकुर सभी के कल्याण में ताउम्र लगे रहे।

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