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धर्म में स्थिर रहने वाला ही धर्मात्मा

Yashwant Vyas Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
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एक बार भगवान बुद्ध से किसी जिज्ञासु ने पूछा, सच्चा धर्मात्मा कौन है? बुद्ध बताते हैं, वही धर्मात्मा है, जो कभी धर्माचरण में प्रमाद-आलस्य नहीं करता।
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बुद्ध उपदेश में कहते हैं, स वे धम्मधरो होति यो धम्मं नप्पमञ्जति। सवै धर्मधरो भवति यो धर्म न प्रमाद्यति।। अर्थात, जो पवित्रात्मा है, वह शील एवं सम्यक दृष्टि से संपन्न धर्म में स्थित रहता है। सत्य व अहिंसा का पालन करता है। वह कभी किसी को न हानि पहुंचाता है, न दुखी करता है। शील व सदाचार का पालन करने में कभी आलस्य नहीं करता।
तथागत कहते हैं, वह धर्मात्मा ही यशस्वी होता है, जिसे अपने माता-पिता व वृद्धजनों की सेवा से आनंद की अनुभूति होती है। ऐसा शीलवान सदाचारी पुरुष निंदनीय कर्म और हिंसा से सर्वथा मुक्त रहता है। वह आगे कहते हैं, कभी क्रोध न करने वाला, व्रतधर, शीलवान और संयमी को ही मैं ब्राह्मण (ज्ञानी), निष्पाप जीवन जीने वाला मानता हूं। उसकी समग्र शक्ति उसकी क्षमावृत्ति में निहित होती है।
जो धीर पुरुष अपने कर्म, वाणी एवं मन से संयमवान है, वही पूर्ण मानव है। तथागत उपदेश में कहते हैं, जो संयमी नहीं है, जिसका चित्त स्थिर नहीं है, जो सद्कर्म को नहीं जानता तथा जिसकी मन की प्रसन्नता अस्थिर है, उसकी प्रज्ञा पूर्ण नहीं हो सकती, किंतु जो अनासक्त, अपरिग्रही तथा अन्य दुर्गुणों से रहित है, वे तो लोक में ही निर्वाण प्राप्त कर चुके हैं।
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