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ऐसे आईं लक्ष्मी देवताओं के पास

Yashwant Vyas Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
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धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि लक्ष्मी स्थायी रूप से उसी के पास निवास करती हैं, जो पुरुषार्थी, शीलवान और सदाचारी हो। प्रमादी, दुराचारी व दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति के पास लक्ष्मी ज्यादा समय नहीं ठहरती।
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महाभारत के अनुशासन पर्व में एक कथा आई है। एक बार लक्ष्मी असुरराज बलि को त्यागकर देवराज इंद्र के पास पहुंची। इंद्र ने पूछा, सुंदरी, तुमने असुरराज बलि का त्याग क्यों किया? लक्ष्मी ने बताया, असुर होते हुए भी बलि सत्यवादी, जितेंद्रिय और सत्पुरुषों, विद्वानों के हितैषी थे। वह नारियों का सम्मान करते थे तथा असहायों की सेवा सहित तमाम सद्कर्म करते थे। लेकिन अब असुरराज बलि के परिजन इसका उलटा आचरण करने लगे हैं।


शील, सदाचार का त्याग करके वे हमेशा खाने-पीने में लगे रहते हैं। पत्नी पति की और पुत्र पिता की आज्ञा नहीं मानता। अचानक कोई अतिथि उनके द्वार पर पहुंचता है, तो उसे डपटकर भगा देते हैं। दुर्गुणों के कारण उनके घर में कलह रहने लगी है। वे धनार्जन के लिए पुरुषार्थ करने को तत्पर नहीं रहते। ऐसे दुराचारी-पापाचारी असुरों के बीच मैं भला शांति की अनुभूति कैसे कर सकती हूं।

लक्ष्मी ने आगे बताया, देवराज, जहां मैं रहूंगी, वहां आशा, श्रद्धा, धृति, क्षमा, शांति, विजित, संतति और जया, ये सभी आठ देवियां भी साथ रहेंगी। देवों ने लक्ष्मी का अभिनंदन कर उन्हें पूर्ण सम्मान के साथ अपने यहां स्थान दिया।

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