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क्या सियाचिन की बर्फ पिघलेगी

Tavleen Singh Updated Fri, 15 Jun 2012 12:00 PM IST
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The snow melts the Siachen
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बीते महीने एक लेख में ब्रिटेन में रहने वाले पत्रकार जफर इकबाल ने लिखा कि पाकिस्तान हर रोज सियाचिन में अपनी सेना के रख-रखाव पर दस लाख डॉलर खर्च करता है और भारत को संतुलन बनाए रखने के लिए इससे दोगुना खर्च करना पड़ता है। यदि इस आंकड़े में कोई सचाई है, तो सियाचिन में दशकों से आमने-सामने तैनात भारत पाकिस्तान की सेना हटाने की जरूरत दोनों देशों को शिद्दत से महसूस हो रही होगी।
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आपस में झगड़ते मियां-बीवी की तरह मुश्किल इस बात की आ रही है कि सुलह की बात मुंह से बोल तो दोनों रहे हैं, पर पहल कौन करे। मुद्दा यह है कि जो पहल करेगा, उसको कहीं पराजित या कायर तो नहीं मान लिया जाएगा? बहरहाल पिछले दिनों भयानक हिमस्खलन में सौ से ज्यादा पाक सैनिकों के मारे जाने से दबाव में आए पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष ने दोनों देशों के बीच सेना हटाने के मुद्दे पर बात करने का प्रस्ताव दिया, तो दोनों देशों के सचिवों की बातचीत हुई। नतीजा इतनी जल्दी निकल आएगा, इसकी उम्मीद न तो किसी ने की थी और न ही ऐसा कुछ हुआ।
इससे पहले भी कई बार सियाचिन को वैज्ञानिक शोध के एक अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव अलग-अलग स्तरों पर किया गया है। इसके लिए अंटार्कटिका क्षेत्र में स्थापित भारत सहित अनेक देशों के अनुसंधान केंद्र होने का उदाहरण दिया जाता रहा है, पर इससे दो देशों के बीच के विवाद के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ले लेने की आशंका नेताओं को सताती रही है। हमारे प्रधानमंत्री भी सियाचिन में शांति पार्क बनने का प्रस्ताव कर रहे हैं।
पर सियाचिन महज एक सैन्य बहुल क्षेत्र हो, ऐसा नहीं है। मौसम में हो रहे परिवर्तनों से ग्लेशियरों के पिघलने को लेकर गहरे विवाद हैं। वैज्ञानिकों का एक समूह कहता है कि यह तेजी से पिघल रहा है, तो दूसरा धड़ा अमेरिकी संगठन नासा के हवाले से यह मान बैठा है कि हिमालय के इस क्षेत्र में आधे से ज्यादा ग्लेशियरों के और बड़े होते जाने के प्रमाण मिले हैं। दोनों पक्ष कहते हैं कि सियाचिन में सेना की व्यापक हलचल, ईंधन जलाने के कारण पैदा हुए कार्बनयुक्त धूल का बर्फ की सतह पर जमा हो जाने और चोरी-छिपे खनन की बढ़ती घटनाओं से इस ग्लेशियर का कुदरती पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा गया है। पाकिस्तानी पक्ष लंबे समय से भारतीय सेना पर इस क्षेत्र में व्यापक खनन के आरोप लगाता रहा है।

हाल में भारत ने अधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि सियाचिन में उसके कब्जे के क्षेत्र में भूतापीय (जियो थर्मल) ऊर्जा के विशाल स्रोत हैं और वह उनका दोहन करने की कोशिश कर रहा है। भारतीय सेना के लिए लगभग डेढ़ दशकों से जम्मू-कश्मीर के इन ऊंचे दुर्गम पर सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में पीने के पानी के लिए खुदाई करने वाली निजी स्वामित्व की कंपनी को इसका श्रेय जाता है।विफलताओं की लंबी फेहरिस्त के बाद मध्य अप्रैल में उसके द्वारा खोदे गए साढ़े तीन हजार मीटर गहरे एक कुएं से आखिरकार गरम पानी आ ही गया। हालांकि उसके द्वारा खोदे गए करीब पांच सौ कुएं इस दुर्गम क्षेत्र में सेना की पेयजल की जरूरत पूरी करते रहे हैं। पर गरम पानी के इस कुएं से सियाचिन में एक नया अध्याय शुरू होगा। गरम पानी के इस स्रोत के कारण हमारी सेना को पानी गरम करने के लिए अब कम ईंधन की जरूरत होगी।

अनेक भू वैज्ञानिकों ने देश भर का सर्वेक्षण करने के बाद लदाख और हिमाचल के कुछ इलाके चिह्नित किए थे, जहां गरम पानी उपलब्ध होने के कारण भूतापीय ऊर्जा उत्पादन की संभावना बताई गई थी। कुछ साल पहले अपने तप्त कुंड के लिए प्रसिद्ध हिमाचल के मणिकरण में इससे ऊर्जा उत्पादन के उद्देश्य से एक छोटा विद्युत् संयंत्र लगाया गया था, पर थोड़े समय बाद भू स्खलन की चपेट में आकर वह ध्वस्त हो गया। तीखे सैनिक संघर्ष और मौसम की मार से युद्ध की तुलना में ज्यादा जानें गंवाने वाले बर्फीले सियाचिन के अंतस से निकली जीवनदायी यह ऊष्मा कहीं दो परस्पर विरोधी देशों के हुक्मरानों के स्थायी हृदय परिवर्तन का प्रतीकात्मक संदेश तो नहीं दे रही!
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