ईरान-अमेरिका में चूहे-बिल्ली का खेल

Tavleen Singh Updated Fri, 25 May 2012 12:00 PM IST
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IranUnited States in mouse cat game

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अमेरिका के कैंप डेविड में आठ ताकतवर देशों ने एकजुट हो ईरान पर दबाव बढ़ाते हुए उसे अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित सभी मुद्दों को तेजी से हल करने की हिदायत दी है। हालांकि ईरान को ऐसी हिदायत पहली बार नहीं दी गई है, फिर भी ऐसा लग रहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चूहे-बिल्ली का जो खेल चल रहा है, उसके पटाक्षेप की तैयारियां लगभग पूरी होने वाली हैं। देखना यह है कि पटाक्षेप का तरीका क्या होता है-सिर्फ कूटनीतिक या फिर परंपरागत या सैन्य कार्रवाई?
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कैंप डेविड में वैसे तो सबसे अहम मुद्दा यूरो जोन संकट ही था, क्योंकि यूरोपीय देश जिस तरह मंदी की गिरफ्त में जा रहे हैं, उसे थामने के लिए नीतियां बनानी आवश्यक हैं, लेकिन ईरान और सीरिया के साथ उत्तर कोरिया को भी उस बैठक में अहम स्थान दिया गया। जी-8 का कैंप डेविड सम्मेलन ईरान जैसे मामले पर आठ ताकतवर देशों के बीच सर्वसम्मति तलाशने के लिए एक अच्छा मंच था। वहां इन देशों द्वारा उन चुनौतियों पर भी विमर्श किया जाना था, जो ईरान पर तेल निर्यात पाबंदियों के बाद उपजनी हैं।
तेल निर्यात पर पाबंदियों के बाद उपजने वाली चुनौतियों पर जी-8 नेता अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करने का पूरा प्रयास करते दिखे। उनका कहना था कि ईरान पर तेल निर्यात पाबंदी के बावजूद देशों को कच्चे तेल की आपूर्ति समय पर ही होगी। हालांकि जी-8 देशों ने स्वीकार किया कि ईरान पर पाबंदियों के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधाओं से विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम पैदा होगा। लेकिन दुनिया के देश उनकी मुहिम से दूर न भागें, इसलिए वे संयुक्त बयान के जरिये जोखिम पैदा न होने देने की गारंटी लेते दिखे। हालांकि इतिहास को देखें, तो इन देशों पर पूरी तरह विश्वास करने की वजह नहीं बनती।
जी-8 चाहता है कि ईरानी नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों का पालन करे और परमाणु अप्रसार संधि के तहत प्रतिबद्धताओं को स्वीकारे। लेकिन क्या ईरान ऐसा करेगा? अगर नहीं, तो क्या ईरान को अब उलटी गिनती शुरू कर देनी चाहिए? लेकिन ईरान पर दबाव बनाने वाले यही देश पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के मामले में पूरी तरह आंखें मूंदे रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी सच है कि ईरान जितनी दबंगई दिखा रहा है, उससे कहीं अधिक डरता भी दिख रहा है। हो सकता है कि उसका डर ही उसकी दबंगई प्रदर्शित करने का असल कारण हो।
ईरान अब चारों तरफ से घिरता नजर आ रहा है और ईरानी राष्ट्रपति आंतरिक मोरचे पर कुछ नए संघर्षों का सामना करते हुए कमजोर से पड़ रहे हैं। ये बदलाव वास्तविक हैं या कृत्रिम, यह कहना मुश्किल होगा। लेकिन जिस तरह की स्थितियां बन रही हैं उन्हें देखते हुए ईरान द्वारा अपने व्यवहार में बदलाव लाना ही श्रेयस्कर लगता है।

पिछले काफी समय से यह चर्चा भी सुनाई दे रही है कि सुन्नी अरब दुनिया को शिया फारस (ईरान) की ताकत से भय लगने लगा है। इसलिए शिया फारस के खिलाफ उसने लामबंदी भी शुरू कर दी है। इसकी शुरुआत सउदी अरब और उसके सहयोगी बहरीन की तरफ से की गई है। अरब देश जास्मिन क्रांति के बाद ईरान के इसलामी गणराज्य से क्रांति के निर्यात होने और उसके विभिन्न आतंकवादी संगठनों से रिश्ते के कारण उससे कुछ ज्यादा ही भय खा रहे हैं। उनका यह भय मिथ्या भी नहीं है, क्योंकि ईरान खुद अरब देशों में शिया कार्ड खेल रहा है।

जाहिर है, अरब दुनिया के पीछे अमेरिका है। ईरान अपना सुरक्षा कवच तैयार करना जरूरी समझ रहा है और प्रतिपक्षी उसे हर हाल में रोकना अपना धर्म मान रहे हैं। ऐसे में भारत को हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा, क्योंकि अमेरिका यह खेल उस तरह नहीं खेलना चाहेगा, जैसा उसने इराक में खेला था। वह ईरान को आर्थिक और सामरिक, दोनों मोरचे पर घेरने की युक्ति पर काम कर रहा है। फिलहाल तो कैंप डेविड फरमान के बाद अब बगदाद बैठक की प्रतीक्षा है। देखना यह है कि लंबे समय से चल रहा चूहे-बिल्ली का खेल जारी रहता है या इसका पटाक्षेप होता है।
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