बाजार के प्रिय चिदंबरम

Mrinal Pandey Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
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देश की विकास दर में गिरावट और सूखे के आगमन के बीच पी चिदंबरम ने एक बार फिर वित्त मंत्रालय की कमान संभाली है। एक बड़ा तबका उनसे चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठा हुआ है। इस बीच उन्होंने विदेशी निवेशकों की विश्वास बहाली और उद्योग जगत को सकारात्मक संदेश देने के लिए कुछ घोषणाएं भी की हैं। इसमें जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल (गार) को लेकर विदेशी निवेशकों में बने डर को दूर करने की कोशिश की गई है।

कर चोरी और काले धन को रोकने के लिए बनाए गए गार के पीछे सरकार का एक ही लक्ष्य है कि जो भी विदेशी कंपनी भारत में निवेश करे, वह यहां के नियमों के मुताबिक कर दे। जब देश के ज्यादातर हिस्से सूखे से प्रभावित हैं, खाद्यान्न में कमी के आसार हैं, महंगाई के अपने चरम पर पहुंचने का खतरा बना हुआ है, तो ऐसे में वित्त मंत्री की चिंताएं सिर्फ विदेशी निवेशकों, शेयर बाजार के संवेदी सूचकांक पर ही सीमित क्यों हैं?

दरअसल सरकार यह संदेश देना चाहती है कि पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में सुधारों से जुड़े जो भी फैसले रुक गए थे, उन्हें गति दी जाएगी। चिदंबरम और प्रणब में यही मूल अंतर है। प्रणब खुद को इंदिरा गांधी के 'गरीबी हटाओ' के नारे और समाजवाद के ज्यादा नजदीक पाते थे। जबकि चिदंबरम, मनमोहन सिंह के खुले बाजार और पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार हैं।

पर हैरानी इस बात की है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमियों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हमारे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। महंगाई और खासकर खाद्य पदार्थों की कीमत में वृद्धि का सबसे ज्यादा असर गरीबों और निम्न मध्यवर्ग पर ही पड़ा है, क्योंकि उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा इसी मद में खर्च हो जाता है।

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के मुताबिक आय में विषमता बढ़ रही है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भले ही हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर आठ-नौ फीसदी के आसपास रही है, पर इसका फायदा समाज के उच्च तबके को ही मिला है। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की आय में खास फर्क नहीं आया है।

इसके अलावा विकास दर का प्रभाव अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों पर अलग-अलग पड़ा है। कुछ क्षेत्रों में संपन्नता आई है, जबकि कुछ घोर गरीबी भोगने के लिए अभिशप्त हैं। इस विषमता से असंतोष फैल रहा है। मानेसर स्थित मारुति सुजुकी के संयंत्र में एक मैनेजर की मौत इसका ताजा उदाहरण है।

असमानता की स्थिति का अंदाजा हम इस बात से लगा सकते हैं कि एक उच्च वर्गीय परिवार पांच सितारा होटल में एक बार के खाने में कम से कम पांच से छह हजार रुपये खर्च कर देता है, जबकि मारुति जैसे तमाम संयंत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को इतना ही मासिक वेतन मिलता है। और उन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। यही नहीं, झाड़ू-पोछा और साफ-सफाई जैसे घरेलू काम करने वालों को भी तकरीबन पांच से छह हजार रुपये महीने मिल जाते हैं। इन स्थितियों में आर्थिक उदारीकरण के बाद पनपे प्रबंधन और श्रमिकों के बीच असंतोष उठना स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से इस ओर किसी की नजर नहीं है।

सरकार का सारा ध्यान उद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों के हितों पर है। इससे असंगठित और अनियंत्रित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशकों का रुख अस्थिर होता है। वे एक दिन खरीदारी करते हैं, तो अगले दिन बिकवाली। बाजार में उठापटक का यह सबसे बड़ा कारण है। इसके बाद भी सरकार की विदेशी निवेशकों की इतनी चिंता बेहद हैरान करने वाली है।

संभव है कि चिदंबरम शेयर बाजार को मजबूती देने में कुछ कामयाब हो जाएं, लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था शेयर बाजार पर ही नहीं टिकी है। रही बात व्यापक आर्थिक सुधार की, तो इस दिशा में केवल चिदंबरम के चाहने भर से कुछ नहीं होने वाला। खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पेंशन क्षेत्र में सुधार से जुड़े कानूनों को अंतिम रूप दे पाना सरकार के लिए आसान नहीं है।

कैबिनेट तो रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अपनी मंजूरी दे चुका है, पर विपक्ष और सहयोगी दल ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर के समाजवादी विचारधारा वाले नेता भी इसके खिलाफ हैं। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि वॉलमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों के देश में आने से किसानों को उनकी उपज का ज्यादा से ज्यादा मूल्य मिल सकेगा, जबकि उपभोक्ताओं को सस्ती दर पर वस्तुएं उपलब्ध हो सकेंगी। लेकिन सरकार के कर्ताधर्ता इसके विरोधियों को इस तर्क से संतुष्ट कर पाने में नाकाम रहे हैं।

इसके अलावा डर यह है कि अगर वॉलमार्ट जैसी कंपनियां भारत में आती हैं, तो देश में खुदरा कारोबार से जुड़े करोड़ों लोगों की जीविका खतरे में पड़ जाएगी। चिदंबरम सिर्फ उद्योग जगत के नहीं, बल्कि पूरे देश के वित्त मंत्री हैं, और ऐसे में उनसे व्यापक दृष्टिकोण और आम आदमी के हितों वाले फैसलों की उम्मीद करना स्वाभाविक है। देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्याओं से जुड़ी खबरें आए दिन आती रहती हैं। सूखे के चलते इसके और बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में वित्त मंत्री कोई चमत्कार तभी कर सकते हैं, जब वह इन मूल समस्याओं की ओर ध्यान दें।

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