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चीनी की गायब होती मिठास

Mrinal Pandey Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
Sugar Shortage Rising Prices Consumer Farmers Interest
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आजकल चीनी की कमी और उसकी बढ़ती हुई कीमतों का जो संकट अचानक आम आदमी या चीनी व्यापारियों और उद्यमियों के लिए पैदा हो गया है, इसका जिम्मेदार कौन है? लगभग दो बरसों से उपभोक्ता मंडियों में चीनी की कीमतें स्थिर चल रही थीं। आखिर वे क्या मजबूरियां थी कि सरकार को किसान-हित के नाम पर ऐसे कदम उठाने पड़े, जिससे चीनी की कीमतों का संतुलन ही बिगड़ गया, और इसकी कालाबाजारी शुरू हो गई? आज आम जनता सत्ता के कर्णधारों के खाद्य पदार्थों और जरूरी वस्तुओं के कीमत नियंत्रण के उन वायदों की ओर देखता है, जो पिछले छह सात बरसों में कभी वफा नहीं हुए।
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यदि जरूरी वस्तुओं की कीमतों के बढ़ जाने के कारणों की पड़ताल करें, तो वे हमें इतने सरल नहीं लगते, जैसा कि सरकारी विभागों द्वारा दिखाने का प्रयास किया जाता है? महंगाई क्यों अनियंत्रित हुई? क्या इसका सीधा उत्तर यही है कि सरकार द्वारा पिछले वर्षों में किए गए मौद्रिक नीति के परिवर्तन और मुद्रा और साख संकुचन के प्रयास विफल रहे? अगर कारण इतने ही सतही हैं, तो बताइए कि पिछले दिनों पंजाब सरकार द्वारा अधिक राजस्व उगाहने के प्रयास में चीनी की कीमतों पर पांच फीसदी वैट और दस फीसदी सरचार्ज लगाने की क्या आवश्यकता थी?

सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए हरियाणा, हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्य पहले कर रहित बजट पेश करते हैं, फिर अपना काम चलाने के लिए ऐसे अप्रत्यक्ष करों के चोर दरवाजे खोलते हैं। पंजाब की बादल सरकार भी पहले इसी परिपाटी का पालन करते हुए कररहित बजट प्रस्तुत करके तालियां बटोरी और अब चीनी पर वैट और सरचार्ज लगाकर कीमत वृद्धि का दुष्चक्र पैदा कर दिया है, लेकिन इस विसंगति की गहराई से जांच करें, तो कुछ और प्रश्न भी उभर आते हैं।

पहला सवाल तो यही है कि पंजाब ने बेशक अभी चीनी की कीमतों पर वैट और सरचार्ज लगाया, पर इससे पहले स्वयं केंद्र सरकार ने चीनी के निर्यात की इजाजत क्यों दी थी? इससे स्वदेशी मंडियों में चीनी की आपूर्ति कम हुई और कीमत संतुलन बिगड़ गया। इससे छोटे किसानों का क्या भला होना था। हां, ताकतवर शूगर लॉबी की पौ-बारह अवश्य हो गई।

अब यह भी स्पष्ट हो गया है कि इस वर्ष सामान्य से कम हो रही बारिश किसान के दुर्भाग्य का संदेश लेकर आई है। हरियाणा और पंजाब सहित देश के कई भाग भयावह सूखे की चपेट में आ गए हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि राज्यों में, जहां गन्ने की फसल बोई जा चुकी थी, वहां कम बारिश की वजह से फसल खेतों में खड़ी-खड़ी ही सूख गई है। स्पष्ट अनुमान है कि इस बरस गन्ने और चीनी का उत्पादन पिछले बरस से कम होगा। लेकिन सरकार इस सूखे का मुकाबला करने के लिए उचित नीतियों की घोषणा तत्काल क्यों नहीं करती? उचित नीति यह थी कि चीनी के निर्यात आदेशों को तत्काल वापस ले लिया जाता और खाद्य उत्पादों में हर प्रकार के अग्रिम सौदों या सट्टा का निषेध कर दिया जाता, लेकिन सरकार इस या ऐसे ही सभी फैसलों पर टालमटोल अथवा स्थगन की नीति अपनाती रही है। आखिर ऐसा क्यों?

पिछले दिनों चीनी मिलों द्वारा पंजाब के किसानों से खरीदी गई फसल के दाम समय पर भुगतान न करने की समस्या ने ध्यान खींचा था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भुगतान 15 दिनों के अंदर करने का फैसला भी दिया। फसलों के भुगतान का यह बकाया सौ करोड़ रुपये बनता है, और यह बरसों से अटका है। अब मिल अधीक्षकों का कहना है कि यह बकाया पंजाब सरकार की गलत नीति के कारण इकट्ठे हुए। न तो सरकार ने उन्हें चीनी के स्टॉक बेचकर भुगतान करने की इजाजत दी और न ही स्वयं राशि जारी की।

पंजाब की जिन मिलों को ऐसे आदेश मिले हैं, वे सभी सहकारी मिलें हैं, जो पहले ही घाटे में चल रही थीं। दुर्भाग्य से केंद्र हो या राज्य सरकार, किसी ने अनुदान प्रोत्साहन नीति में पंजाब की सहकारिता को प्राथमिकता सूची में नहीं रखा। अब यदि सहकारी चीनी मिलें इस सौतेले व्यवहार की चपेट में आ जाती हैं, तो पूरा नियंत्रण चीनी सम्राटों के हाथ में आ जाएगा, जिसे आम आदमी की नहीं, अपने लाभ की चिंता होगी।

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