कमजोर डैनों से ऊंची उड़ान

Mrinal Pandey Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
Kingfisher Airlines pilots strike

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
पायलटों की हड़ताल से परेशान किंगफिशर एयरलाइंस की समस्या का फिलहाल अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है। पिछले शनिवार को इसने जिस तरह से अपनी निश्चित उड़ानों को रद्द करने की घोषणा कर दी, उससे इसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। किंगफिशर एयरलाइंस का यह मामला हमारे नागर विमानन उद्योग का असली चेहरा दिखाता है। जब हवाई यात्रियों की संख्या में सालाना 18 फीसदी की वृद्धि हो रही हो, वैसे समय में पूरे उद्योग को ही फलना-फूलना चाहिए था, पर आज पूरा उद्योग ही बीमार पड़ा है। इसमें हम नागर विमानन उद्योग के निजीकरण की विफलता भी देख सकते हैं।
विज्ञापन

इसके पहले की कई निजी विमानन कंपनियां बंद हो चुकी हैं और कई का वर्तमान कंपनियों में विलय भी हो गया है। डक्कन एयरवेज नाम की कंपनी का तो किंगफिशर में ही विलय हुआ था। सहारा एयरलाइंस को जेट एयरवेज ने खरीद लिया था। ईस्ट वेस्ट एयरवेज नाम की भी एक कंपनी थी, जो बंद हो चुकी है। इस बीच निजी विमानन कंपनियों के साथ-साथ सरकारी कंपनी एयर इंडिया की हालत भी पतली है।
किंगफिशर एयरलाइंस कोई आम निजी कंपनी नहीं है। वर्ष 2009 में यह हवाई यात्रियों को ढोने के मामले में देश की सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी थी। दिसंबर, 2011 तक यह देश की दूसरी सबसे बड़ी विमानन कंपनी के अपने रुतबे पर विराजमान थी। लेकिन किसी भी कंपनी को अपनी मजबूती बनाए रखने के लिए लाभ में होना जरूरी है, पर किंगफिशर एयरलाइंस 2005 के अपने जन्मकाल के बाद से ही किसी भी वर्ष फायदे में नहीं रही। घाटे के बावजूद इस कंपनी का लगातार विस्तार अपने आप में एक विचित्र घटना है। जिस डक्कन एयरलाइंस को इसने खरीदा था, वह घाटे में चल रही थी। जाहिर है, उसे खरीदने के बाद इसका घाटा और भी बढ़ गया। लेकिन बढ़ते घाटे के बीच में ही उसने अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भरने का भी फैसला कर लिया, जिससे उसका घाटा और बढ़ने लगा।

किंगफिशर एयरलाइंस अपने मालिक विजय माल्या की प्रबंधन अकुशलता और अति महत्वाकांक्षा का शिकार हो गई है। माल्या इसे देश की सबसे बड़ी विमानन कंपनी बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने किराये में कमी करना शुरू कर दिया। इसका असर न केवल उनकी एयरलाइंस के स्वास्थ्य पर पड़ा, बल्कि पूरा विमानन उद्योग ही इसकी चपेट में आ गया। अन्य कंपनियों को भी यात्री किराये में कमी करनी पड़ी। सबका नुकसान होने लगा। सरकारी कंपनी एयर इंडिया भी इससे अछूती नहीं रही। किराया कम करके सबसे ज्यादा यात्री को आकर्षित करने में सफल होना एक बात है और उस सफलता को बरकरार रखना दूसरी बात, और इस दूसरी बात में यह कंपनी विफल रही। देश की कुल छह विमानन कंपनियों में यह आज पांचवें स्थान पर है और बंद होने के खतरे का भी सामना कर रही है।

आखिर किंगफिशर की मूल समस्या क्या है? इसकी मूल समस्या यह है कि इस कंपनी की स्थापना के पहले विजय माल्या को विमानन उद्योग के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। वह शराब की एक कंपनी चलाया करते थे। पर केंद्र सरकार की जो विमानन नीतियां थीं, उनमें इस बात का प्रावधान ही नहीं था कि विमानन उद्योग में एयरलाइंस का लाइसेंस देने के पहले इस पर भी विचार किया जाए कि जिस व्यक्ति को यह लाइसेंस दिया जा रहा है, उसका इस उद्योग से कभी कोई संबंध रहा भी है अथवा नहीं। अनेक निजी एयरलाइंस कंपनियों के मामले में भी यही हुआ। नतीजतन निजी कंपनियों में एक गलाकाट प्रतियोगिता होने लगी और सब अपना-अपना गला ही काटते दिखाई पड़े। इसका परिणाम यह निकला कि 2007 में पूरे नागर विमानन उद्योग का घाटा 9,000 करोड़ रुपये का था।

कंपनियां इतने घाटे में चल रही हों, उसके बावजूद बाजार में बनी हुई हों, यह आश्चर्यजनक लगता है। पर हमारे देश में सब कुछ संभव है। हमारे देश के एयरलाइंसों के मालिकों के लिए यह जरूरी नहीं है कि उनके पास अपने स्वामित्व वाले विमान भी हों। अधिकांश विमानन कंपनियों के पास अपने विमान ही नहीं हैं। किंगफिशर के पास भी नहीं हैं। सभी विमान किराये पर लेकर चलाए जा रहे हैं। विमान रखने की जगह भी किराये पर मिलती है।

हवाई अड्डे उनके अपने हो ही नहीं सकते। उनके इस्तेमाल के एवज में किराया दिया जाता है। इन सबसे बड़ी बात यह है कि कंपनियों में जो पैसे लगे होते हैं, वे भी मालिकों के नहीं, बल्कि बैंकों के होते हैं। विमान उड़ाने के लिए जरूरी ईंधन की खरीद का भुगतान भी उसी समय कर दिया जाए, कोई जरूरी नहीं। तेल उधार में भी मिल जाता है। यानी बिना कोई पूर्व अनुभव और बिना कोई खास वित्तीय निवेश के आप अरबों रुपये का व्यापार कर रही विमानन कंपनियों के मालिक बन सकते हैं। पर यदि उद्योग के बारे में सही जानकारी नहीं हो, तो फिर कंपनियों का डूबना भी रोका नहीं जा सकता। यही समस्या किंगफिशर एयरलाइंस की है।

यदि यह कंपनी डूबती है, तो उन बैंकों का नुकसान होगा, जिन्होंने इसे उधार दे रखे हैं। उन तेल कंपनियों का भी नुकसान होगा, जिसके तेल का भुगतान नहीं किया गया है। उन विमान कंपनियों का भी नुकसान होगा, जिनके विमानों के किराये नहीं दिए गए हैं। देखना यह है कि विजय माल्या क्या किंगफिशर एअरलाइंस को हवा में गुम होने से रोक सकते हैं और शेयरधारकों का नुकसान बचा सकते हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
  • Downloads

Follow Us