खुदरा में निवेश से खुलेंगे रास्ते

Mrinal Pandey Updated Thu, 12 Jul 2012 12:00 PM IST
retail sector fdi economy technology and expert
अपने यहां खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर अब तक आम सहमति नहीं बन पाई है। इसके समर्थक इसे बड़ी नीतिगत जरूरत बता रहे हैं और दावा करते हैं कि इसके जरिये गिरती अर्थव्यवस्था को थामा जा सकता है। उनके मुताबिक, यह अपने साथ न केवल विदेशी धन, बल्कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञ भी लेकर आएगा और इससे आधारभूत संरचना का निर्माण भी हो सकेगा, किसानों को वाजिब दाम मिल सकेंगे तथा आनुषांगिक उद्योगों का निर्माण होगा, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

इसके ठीक उलट विरोधियों का तर्क है कि अगर इस नीति को मंजूरी दी गई, तो छोटे किसान, छोटे व्यापारी और रेहड़ीवाले खत्म हो जाएंगे। इससे भीषण रोजगार संकट पैदा होगा, भारतीय उद्योग पर नकारात्मक असर पड़ेगा और देश में चीन जैसे देशों के सस्ते उत्पादों की बाढ़ आ जाएगी। दोनों पक्षों के तर्कों को अनदेखा नहीं किया जा सकता, पर सच यही है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश से न तो आर्थिक तबाही आएगी और न ही यह कोई जादुई छड़ी साबित होने वाली है। हां, अगर एहतियातन इसके इस्तेमाल को मंजूरी दी गई, तो यह राष्ट्रहित में ही होगा।

वर्ष 2002-03 के दौरान दो पूर्व दूरसंचार मंत्री रामविलास पासवान और प्रमोद महाजन अलग-अलग मौकों पर अमेरिका गए थे। उन्हें मोटरोला और लूसेंट टेक्नोलॉजी को नजदीक से देखने का मौका मिला। 2 जी तकनीक के फायदे गिनाते हुए उन्हें बताया गया कि किस तरह यह तकनीक भारत के दूरसंचार क्षेत्र के पूरे परिदृश्य को बदल देगी और उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाएगी। लेकिन भारत में उस तकनीक पर संदेह जताया गया। तर्क दिए गए कि दूरसंचार क्षेत्र को खोलने से बड़ी संख्या में छंटनी होगी, सेलफोन आम आदमी की पहुंच में नहीं होगा और चूंकि खासतौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दिलचस्पी सिर्फ मुनाफे पर होगी, इसलिए इसकी दरें काफी ऊंची होंगी। इतिहास गवाह है कि इतनी संख्या में कभी लोग गलत साबित नहीं हुए, जैसे तब हुए थे। आजाद भारत में दूरसंचार क्रांति ही एकमात्र ऐसी क्रांति है, जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए। आज मछुआरे, घरेलू नौकर, ड्राइवर आदि से लेकर उद्योगपतियों और प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक के हाथों में मोबाइल है।

वर्ष 1972 में युवा राजनयिक के रूप में मुझे बजाज का एक चेतक स्कूटर हासिल करने के लिए उद्योग मंत्रालय के डिप्टी सेक्रेटरी तक से चिट्ठी लिखवानी पड़ी थी और नौ महीने बाद ही मेरा वह सपना पूरा हो पाया था। एंबेसडर या फिएट कार की तो बात ही छोड़ दीजिए। मगर 40 वर्ष बाद ऑटोमोबाइल क्षेत्र में एफडीआई और गलाकाट स्पर्द्धा की वजह से आप अपनी क्षमतानुसार नैनो या मर्सीडिज खरीद सकते हैं। पिज्जा हट, डोमिनो, मैकडोनाल्ड, विम्पी, केएफसी जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स को जब देश में आने की अनुमति मिली, तब कहा जा रहा था कि इनके आने से हल्दीराम, निरुला, नत्थू और बीकानेरवाला जैसे भारतीय व्यवसायी खत्म हो जाएंगे। आज हम देख सकते हैं कि हम कितने गलत थे!

यह हकीकत है कि आज भी लोग भूखे रहने को विवश हैं, जबकि गोदामों में पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण लाखों टन अनाज सड़ रहा है। पंजाब के किसानों से पूछें कि उन्हें कितना दुख होता है, जब उनकी फसल के खरीदार नहीं मिलते। क्या वे अपने उत्पाद की ऊंची कीमत के लिए मोल-भाव कर सकते हैं? सूर्य की जब तपिश बढ़ती है, तो फल दो दिनों से ज्यादा नहीं टिक पाता। मीडिया में ही दिखाया जाता है कि किस तरह मिलावटी घी, दूध आदि कपड़े धोने के पाउडर से बनाए जाते हैं, आम और पपीता जैसे फल रसायन से पकाए जाते हैं और फलों की सड़न रोकने के लिए उनमें घातक सूई लगाई जाती है। सफल के केंद्रों पर ही पीले हो चुके गोभी और पालक बेचे जाते हैं, फूलगोभी में कीड़े लगे होते हैं। क्या इसकी वजह विदेशी निवेश है?

सामान्य फेरीवाले और छोटे किराना दुकानदारों की वाक्पटुता को कोई नहीं नकार सकता। वे जानते हैं कि कैसे ग्राहकों को अपने उत्पाद के प्रति आकर्षित किया जा सकता है और उनके ग्राहक भी पक्के होते हैं। निस्संदेह मांग और आपूर्ति की यह आपसी निर्भरता टेस्को, केयरफोर या वाल-मार्ट जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के आने से भी नहीं बदलेगी। इसी तरह हमें चीन के डर को भी खत्म करना चाहिए। खुदरा बाजार में एफडीआई के बिना भी हमारे बाजारों में 50 फीसदी से अधिक इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ऐसे हैं, जिसका निर्माण चीन में होता है। चीन की इस मौजूदगी के लिए किस पर दोषारोपण किया जाए? इससे बचा नहीं जा सकता, पर मूल्य और गुणवत्ता के आधार पर इनसे प्रतिस्पर्द्धा जरूर की जा सकती है।

खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का विरोध करने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने दूरसंचार क्षेत्र में एफडीआई का विरोध किया था। भारतीय उद्योग के फायदे को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार इन मेगा स्टोर्स के लिए बाध्य कर सकती है कि 35 प्रतिशत आउटसोर्स वह भारत से ही करें। उन्हें बेहतर बीज के लिए शोध करने, संपर्क सड़कों का निर्माण करने, गोदामों और कोल्ड स्टोरेज की शृंखला स्थापित करने, खाद्य प्रसंस्करण संयंत्र लगाने के साथ ही अपने कर्मियों के लिए स्कूल और अस्पताल खोलने के लिए भी कहा जा सकता है। इस तरह खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के आने से कोई कहे कि रोजगार पैदा नहीं होगा, तो वह गलत साबित होगा।

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