ऊर्जा जरूरतों के लिए परियोजनाएं जरूरी

Mrinal Pandey Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
projects needs required for the Energy
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अपने यहां बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच की खाई यों ही बढ़ती गई और सरकार बिजली उत्पादन विरोधियों के आगे झुकती रही, तो आने वाला समय गंभीर अराजक स्थिति लेकर आने वाला है। इससे न केवल विकास का पहिया थमेगा, बल्कि कानून व्यवस्था की हालत भी बेकाबू हो सकती है।
तमिलनाडू में 9,200 मेगावाट के कुड्डनकुलम और महाराष्ट्र में जैतापुर के 9,900 मेगावाट के परमाणु बिजली घरों से लेकर गुजरात के 3,300 मेगावाट के भद्रेश्वर सहित 47 अन्य तापीय बिजली घरों तक, देश का शायद ही कोई ऐसा प्रोजेक्ट होगा, जिसका विरोध नहीं हो रहा हो। उत्तराखंड में 600 मेगावाट की लोहारी नागपाला, 480 मेगावाट की पाला मनेरी और 381 मेगावाट की भैरोंघाटी परियोजना बंद हुई, तो विरोधियों के हौसले और बुलंद हो गए।

प्रो जी डी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद की सफलता से उत्साहित शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने बक गंगा पर परियोजना विरोध की कमान संभाल ली है। नतीजतन 330 मेगावाट की श्रीनगर और 444 मेगावाट की विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना के भविष्य पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इनमें से श्रीनगर प्रोजेक्ट का 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और उस पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये खर्च भी हो चुके हैं। इसी प्रकार विष्णुगाड-पीपलकोटी का भी लगभग 40 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। राज्य में कुल 20,263 मेगावाट क्षमता की 261 परियोजनाएं विभिन्न चरणों में हैं।

यह सही है कि राष्ट्रहित या समाज के व्यापक हित के नाम पर कई बार ऐसी परियोजनाओं के निर्माण के समय स्थानीय समुदाय के हितों की और खासकर स्थानीय पारितंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी कर दी जाती है। उत्तराखंड में परियोजना विरोधी बाहरी लोगों के अलावा ऐसे लोग भी हैं, जिनको बांध और बैराज में फर्क नजर नहीं आता है। लोग भले ही गरीबी, भुखमरी, शोषण और महंगाई जैसे मुद्दों पर चुप रहते हैं, मगर जब धर्म की बात आती है, तो सड़कों पर उतरकर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। गंगा के मामले में भी धर्म को अफीम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इस अफीम की क्षमता से वाकिफ भुवन चंद्र खंडूड़ी ने सबसे पहले जून, 2007 में पाला मनेरी और भैरोंघाटी परियोजनाओं को बंद कराया, फिर उसके असर से भयभीत यूपीए सरकार के मंत्री जयराम रमेश ने लोहारी नागपाला को रुकवाया। बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने तीनों परियोजनाओं को सदा के लिए बंद करने की सिफारिश कर दी।

बिजली की किल्लत के कारण 44 प्रतिशत से अधिक भारतीय घरों में दैनिक जरूरतों के लिए भी बिजली नहीं है। बिजली की कमी के कारण केंद्र सरकार की 2012 तक हर घर को बिजली उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना परवान नहीं चढ़ पाई है। दुनिया में सर्वाधिक प्रति व्यक्ति बिजली खपत अमेरिका में है और उस देश का दुनिया का भाग्य विधाता होने का एक राज भी यही है। लेकिन भारत में विकास की गति तेज होने के साथ ही बिजली की खपत जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी तेजी से उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ पा रही है।

थर्मल पावर प्लांट अत्यधिक प्रदूषण पैदा करते हैं। हमारे यहां प्राकृतिक संसाधन के रूप में उपलब्ध कोयला भी गुणवत्ता की दृष्टि से आवश्यकता के अनुरूप नहीं है। इसमें उष्मा कम और ऐश कंटेंट ज्यादा बताया जाता है। नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन की अपनी सीमाएं हैं। पन बिजली सबसे साफ सुथरी, सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित मानी जाती है और इस बिजली के लिए उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।

पिछले विद्युत ऊर्जा सर्वे में कहा गया था कि 2003-04 में देश की पीक डिमांड 89 जिगावाट थी, जो कि 2031-32 तक 733 जिगावाट हो जाएगी। इसी प्रकार सामान्य समय की मांग 2003-04 में 633 अरब किलोवाट प्रतिघंटा थी, जो कि 2031-32 तक 4,806 अरब प्रतिघंटा हो जाएगी। लेकिन बिजली परियोजनाओं का इसी तरह विरोध होता रहा, तो लगभग आठ गुना उत्पादन बढ़ाना तो दूर रहा, वर्तमान उत्पादन क्षमता को भी बरकरार रखना मुश्किल होगा।

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सीधी भर्ती प्रक्रिया की जरूरत

केंद्र सरकार के नीति निर्धारण से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले संयुक्त सचिव स्तर पर ही तय होते हैं। यहां तक पहुंचने में एक अधिकारी को लंबा वक्त तय करना पड़ता है। ऐसे में, यदि निजी क्षेत्र के कुछ अनुभवी लोगों को लाया जाता है, तो इससे बड़ा बदलाव आएगा।

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