मंदी का बहाना नहीं चलेगा

Mrinal Pandey Updated Fri, 15 Jun 2012 12:00 PM IST
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स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की भारत से जुड़ी हालिया चेतावनी के संदर्भ में जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मनोज पंत से वेदविलास उनियाल ने बातचीत की।
:- अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स को भारत के बारे में ऐसी चेतावनी क्यों देनी पड़ी? क्या स्थिति वाकई इतनी खराब हो गई है?

:- सचाई यह है कि देश में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का दौर बना हुआ है। आर्थिक संकट से बाहर निकलने की कोशिश नहीं हो रही है। अनुकूल और व्यावहारिक नीतियां अपनाकर देश की आर्थिक स्थिति ठीक की जाए, इसके लिए कहीं कोई चिंता नहीं है। इसके बजाय फिलहाल राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर राजनीतिक संग्राम मचा हुआ है। कहीं नहीं लगता कि निरंतर कमजोर होती जा रही अर्थव्यवस्था के लिए कोई चिंता है। ऐसे में दुनिया भर में भारत के बारे में क्या संदेश जाता है?

:- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके निहितार्थ क्या हैं?

:- इसका मतलब यह कि दोनों अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय नहीं कर रहे। कांग्रेस अध्यक्ष को अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत जानकारी नहीं है। जबकि उदार आर्थिक नीतियों के जनक डॉ. मनमोहन सिंह सहयोगी दलों के बंधक बने बैठे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था से जुड़े कई उदार फैसलों को अनुमति नहीं दी, जिसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है। पर प्रधानमंत्री तृणमूल को मनाने में विफल रहे। यदि आर्थिक संकट से बाहर निकलना है, तो कुछ अलोकप्रिय निर्णय लेने ही होंगे। पर सरकार, संगठन या गठबंधन के साथी दल कोई इस संकट की तरफ नहीं सोच रहा।

:- लेकिन सरकार का यह तर्क भी तो गलत नहीं कि वैश्विक मंदी का हमारी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है।

इसमें कोई शक नहीं। हमारी आर्थिक विकास दर घटकर 6.5 रह गई है, तो उसकी बड़ी वजह वैश्विक मंदी ही है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु का तो यहां तक कहना है कि यूरो जोन का संकट और बढ़ा, तो हमारे लिए स्थिति 2008 से ज्यादा भीषण हो सकती है। पर इस कारण हम हाथ बांधकर तो नहीं रह सकते। हमारे यहां निरंतर बढ़ती मुद्रास्फीति के लिए हम वैश्विक मंदी को तो जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। खाद्य पदार्थों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। न तो हम उत्पादन बढ़ा पा रहे हैं, न ही विपणन की व्यवस्था में कोई सुधार है। पिछले दिनों ब्याज दरों में बढ़ोतरी के जरिये अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने की कोशिश की गई। ब्याज दरों में बढ़ोतरी उद्योग और कृषि, दोनों क्षेत्रों को हतोत्साहित करती है।

:- अब सरकार में शामिल दल भी आर्थिक नीतियों की आलोचना कर रहे हैं। यहां तक कि कृषि मंत्री ने भी सरकार की नीतियों पर कुछ नाखुशी जाहिर की है।

:- दलों की अंदरूनी राजनीति के जरिये इस संकट को देखना ठीक नहीं होगा। साझा गठबंधन में राजनीतिक दलों के बयानों के कई मतलब होते है। हां, इतना जरूर है कि इस समय आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्रतिबद्धता चाहिए। इसमें राजनीतिक हितों को आड़े नहीं आने देना चाहिए।

:- सरकार ने आर्थिक नीतियों को दुरुस्त करने के लिए कमर कसने की बात कही है। क्या इससे कोई उम्मीद पैदा होती है?

:- देखिए, रुपये में गिरावट या लगभग ठप हो चुके निर्यात के मोरचे पर तो आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। उदार अर्थनीति के दौर में सब कुछ आप पर निर्भर नहीं है। लेकिन जिन आर्थिक फैसलों को राजनीतिक ग्रहण लग चुका है, उन्हें लागू करके, खेती को प्रोत्साहित करके, जमाखोरी पर अंकुश लगाकर, महंगाई कम करने की दिशा में कदम उठाकर हम घरेलू अर्थव्यवस्था को गति तो दे ही सकते हैं। अमेरिका व यूरोप की ओर न देखकर हमें अपनी आर्थिक स्थिति ठीक करने के बारे में सोचना चाहिए। फिलहाल जो समस्याएं हैं, उनका समाधान तो यही है।

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