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रहने को घर नहीं सारा जहां हमारा

Mrinal Pandey Updated Thu, 14 Jun 2012 12:00 PM IST
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The house where we all live
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शहरों में कम आमदनी वाले लोगों के लिए मकान मिलना मुश्किल होता जा रहा है, इस बात को ध्यान में रखते हुए आवास मंत्रालय ने एक अभिनव योजना का खाका तैयार किया है, जिसके अंतर्गत बड़े पैमाने पर किराये के मकान तैयार करने तथा जरूरतमंदों को उपलब्ध कराने की योजना है।
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निश्चित ही यह स्वागतयोग्य कदम है। न केवल इसलिए कि योजना को अमली जामा पहनाए जाने के बाद ऐसे तमाम लोगों के लिए सस्ते दर में मकान मिलना मुमकिन हो सकेगा, जिनके लिए शहरों में रहने का कोई इंतजाम नहीं है या जो झुग्गियों में रहने के लिए विवश हैं। बल्कि इस वजह से भी कि सरकार इस मसले पर नए ढंग से सोच रही है और उसने अपने पहले के रुख में व्यावहारिक परिवर्तन किया है।
ज्यादा दिन नहीं हुए, जब शहरी विकास मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत आवास एवं गरीबी उन्मूलन विभाग ने आवास की समस्या पर बनी योजना के मसविदा प्रारूप को जारी किया था, जिसका प्रस्थान बिंदु था, हरेक व्यक्ति को मकान मालिक बनाना। इसके लिए उसका आधार बनी थी एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख की अगुआई में ‘अफोर्डेबल हाउसिंग’ पर बनी कार्यदल की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट में किराये के आवास का कोई हिस्सा नहीं था। पारेख कमेटी चाहती थी कि शहर में रहनेवाला हर कोई एक मकान का मालिक हो।
यह कहना मुश्किल है कि आवास मंत्रालय की प्रस्तावित योजना में मुंबई की विकास योजनाओं में मुब्तिला नियोजनकर्ताओं ने मदद पहुंचाई है या नहीं। लोगों को सस्ते किराये पर मकान उपलब्ध कराने के लिहाज से मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी की विशाल परियोजना काफी चर्चित रही है। इसके अंतर्गत शहर के बाहरी हिस्से में लगभग 43 हजार मकान तैयार करने की योजना बनी है, जो ऐसे परिवारों को आठ सौ से 1,500 रुपये किराये पर उपलब्ध कराए जाएंगे, जिनकी मासिक आय पांच हजार रुपये से अधिक नहीं है। अनुमानतः सात हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना, जिस पर निजी डेवलपर एचडीआईएल काम कर रहा है, शहर के थोड़े बाहरी इलाके में विरार से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर स्थित होगी, जिसके लिए 525 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई है। आकलन है कि यह परियोजना पांच चरणों में पूरी होगी।

गौरतलब है कि अपने कई फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय इस बात को स्वीकारता दिखता है कि लोगों को आवास का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, वह एक तरह से आवास को भी बुनियादी अधिकार का हिस्सा मानता है। अकसर जब हम शहरों के विकास, लोगों के लिए आवास के अधिकार आदि के बारे में बात करते हैं, तो हमारी समूची बातचीत डीडीए जैसे संस्थानों की आलोचना तक अर्थात भ्रष्टाचार और सदाचार के द्वैत तक ही सिमटकर रह जाती है और कई सारे जरूरी सवाल छूट जाते हैं।

हमारे लिए शहरों के विकास का मतलब आसमान छूती इमारतें, फ्लाईओवर, मेट्रो रेल या मोटरीकृत यातायात प्रणालियों की लगातार बढ़ती भीड़ हो जाता है और हम समझते हैं कि शहरों के निर्माण की एक वैकल्पिक कल्पना भी शायद मुमकिन नहीं हैं। और न ही हम यह समझ पाते हैं कि आम नागरिकों के नाम पर शुरू किए गए ऐसे तमाम प्रयास किस तरह कॉरपोरेट समूहों को लाभ पहुंचाने के उद्यमों में परिणत हुए है, जिनमें से आम आदमी ही हाशिये पर जा रहा है।

दरअसल हम अगर आंख उठाकर देखना चाहें, तो विकसित पूंजीवादी मुल्कों में भी हमें नए-नए प्रयोग देखने को मिल सकते हैं। मिसाल के तौर पर कुछ समय पहले अमेरिका के प्रमुख शहर न्यूयॉर्क के मेयर ने यह ऐलान किया था कि शहर के सबसे घने इलाके-जो व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र हैं- ब्राडवे को काररहित और पैदल यात्रियों के इलाके में तबदील किया जाएगा। दुकानों और थिएटरों से भरे उस घने इलाके में वाहनों के घुसने पर पाबंदी होगी। इस तरह की दूरदृष्टि की जरूरत हमारे देश में भी है।
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