महंगी नहीं होंगी कॉल दरें

Mrinal Pandey Updated Fri, 08 Jun 2012 12:00 PM IST
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नई दूरसंचार नीति में फ्री रोमिंग के सरकार के ऐलान से ग्राहकों में खुशी की खबर है। ऐसा कैसे संभव होगा और इसके क्या असर होंगे, इस बारे में मशहूर दूरसंचार विशेषज्ञ महेश उप्पल से धीरज कनोजिया ने बातचीत की।
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नई दूरसंचार नीति में फ्री रोमिंग का दावा किया गया है। यह कैसे संभव है? जबकि सरकार ने कोई समय सीमा नहीं बताई है।
फ्री रोमिंग की सुविधा बिलकुल संभव है। यह ग्राहक के पक्ष में लिया गया फैसला है। अब ऑपरेटर ग्राहकों से रोमिंग के पैसे नहीं लेंगे। सरकार ने इसकी समय सीमा नहीं बताई है, लेकिन इसे लागू करने का काम भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण का है। सरकार ने इसे लेकर नीति बना दी है। अब बाकी का काम ट्राई का है। वह इस सिलसिले में अपनी सिफारिश देगी। कंपनियों समेत सभी पक्षकारों से इस पर राय ली जाएगी। इसमें कुछ महीने लग सकते हैं। लेकिन इसके लागू होने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए।
कई मोबाइल ऑपरेटरों को आपत्ति है। उन्हें चिंता है कि इससे मुनाफा घट जाएगा?
यह बात सही है कि इससे ऑपरेटरों के राजस्व पर कुछ असर पड़ेगा। लेकिन वह इसकी भरपाई दूसरी सेवाओं के दाम बढ़ाकर कर सकते हैं। वैसे भी रोमिंग में प्रति ग्राहक खर्च इतना ज्यादा नहीं आता कि कंपनियों का सारा राजस्व ही इसमें खर्च हो जाएगा।

यानी रोमिंग शुल्क मुफ्त होने से कॉल दरें महंगी हो सकती है?
कंपनियां दाम बढ़ा सकती हैं, लेकिन प्रतिस्पर्द्धा के दौर में अगर कोई ज्यादा दाम बढ़ाता है, तो उसे ग्राहक खोने का डर ज्यादा होगा। अभी कुछ बड़ी कंपनियों को छोड़ दें, तो रिलायंस, एयरसेल और यूनिनॉर जैसी दूसरी कंपनियों के रोमिंग शुल्क बहुत कम हैं। अगर बड़ी कंपनियां मुफ्त रोमिंग की भरपाई के लिए दाम बढ़ाती हैं, तो स्वाभाविक है कि उनके ग्राहक दूसरी कंपनियों से जुड़ सकते हैं। वैसे भी दूरसंचार क्षेत्र में अब धीरे-धीरे कॉल दरों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।

नई नीति में सरकार ने सस्ती सेवा के साथ ही राजस्व कमाने को भी अपनी पहली प्राथमिकता में रखा है। क्या इससे गांवों में फोन सेवाओं पर बुरा असर नहीं पड़ेगा?
जब स्पेक्ट्रम की बड़ी कीमतों की बात हो रही है, राजस्व कमाने की बात हो रही है, जब ऑपरेटर इतनी बड़ी कीमत चुकाएगा, तो जाहिर है वह अपना पैसा बचाने की कोशिश भी करेगा। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों को उठाना पड़ेगा, जहां दूरसंचार सेवा नहीं है। वहां कंपनियां जाने से कतराएंगी। वह शहरों में ही ज्यादा निवेश करने पर जोर देंगी, जहां कम निवेश और ज्यादा कमाई की संभावनाए हैं।

नीति में घरेलू दूरसंचार उपकरणों के निर्माण को लेकर देश को ग्लोबल हब बनाने की बात कही गई है। यह कैसे कारगर होगा?
सरकार अगर इसमें शोध-विकास, निवेश और करों में छूट के माध्यम से घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने का रास्ता बनाती है, तो यह बहुत अच्छा होगा। लेकिन एक कोटा तय करना, कि कंपनियों को इतना प्रतिशत दूरसंचार उपकरण घरेलू कंपनियों से ही खरीदने होंगे, कंपनियों पर थोपने जैसा होगा। यह उद्योग के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा। यह सर्वविदित है कि जब भी कोई प्रतिबंध लगता है तो उसका तोड़ निकालने की कोशिश पहले हो जाती है। इस मामले में भी ऐसा हो सकता है। ऐसी स्थिति से सरकार को बचना चाहिए।

क्या नई नीति में ऐसी व्यवस्था है कि भविष्य में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला न हो?
अगर दूरसंचार नीति 1999 पूरी तरह से लागू होती, तो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला नहीं होता। इसलिए सवाल नीति के लागू होने का है। अब 2जी स्पेक्ट्रम से संबंधित मामले कोर्ट में चल रहे है, तो नई नीति का इससे कोई लेना देना नहीं है। इसलिए अब सरकार और नीति निर्धारकों को भविष्य में नीति को लागू करने में गंभीरता दिखानी होगी।
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