विज्ञापन

आर्थिक दुश्चक्र में फंसा देश

Mrinal Pandey Updated Wed, 06 Jun 2012 12:00 PM IST
a country implicated in the vicious circle of economy
विज्ञापन
ख़बर सुनें
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया कि देश के सामने भीषण आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। गिरती विकास दर ने ही नहीं, बढ़ती महंगाई ने भी लोगों का जीना दूभर कर दिया है। ऊंची विकास दर के साथ मुद्रास्फीति की ऊंची दर को तो उचित ठहराया जा सकता है, पर जब विकास दर गिर रही हो, तब मुद्रास्फीति की दर ऊंची बनी रहने को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। मुद्रास्फीति का मतलब रुपये का घरेलू बाजार में कमजोर होते जाना है। देश की जनता रुपये की इस कमजोरी को पिछले कई वर्षों से देख रही है। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी रुपया कमजोर हो रहा है। पिछले कुछ महीने में डॉलर के मुकाबले रुपये का 20 से 25 फीसदी अवमूल्यन हो गया है। यह एक नई समस्या बनकर आया है।
विज्ञापन
मुद्रास्फीति और अवमूल्यन के बोझ तले रुपया दम तोड़ता दिखाई पड़ रहा है। क्या वाकई भारतीय रुपया मर रहा है? 1991 में वित्त मंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने जब नई आर्थिक नीतियों के तहत आर्थिक सुधारों का कार्यक्रम शुरू किया था, तब उनके विरोधी अर्थशास्त्री कहा करते थे कि इन सुधारों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपया कमजोर होकर मरने लगेगा और घरेलू बाजार में महंगाई इतनी बढ़ेगी कि यहां भी रुपया दम तोड़ देगा। लैटिन अमेरिकी देशों में 1980 के दशक में वैसा ही हुआ था।
लेकिन आर्थिक सुधार की शुरुआत के समय हमारे यहां व्यक्त किया गया वह डर गलत साबित हुआ था।

मनमोहन सिंह ने अपने आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत ही रुपये के अवमूल्यन से की थी। उस अवमूल्यन के कारण विदेशी मुद्रा भंडार समृद्ध होना शुरू हुआ था। महंगाई तेज हुई थी, लेकिन तेज आर्थिक विकास ने बढ़ती महंगाई के दुष्परिणामों से देश के लोगों की रक्षा कर ली थी। क्या 1991 में कुछ अर्थशास्त्रियों द्वारा रुपये की मौत की व्यक्त की गई आशंका दो दशक बाद सही साबित हो रही है? इस पर हमारे नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों को गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि आज रुपये पर दोतरफा हमला हो रहा है। यह भी सच है कि मुद्रास्फीति अवमूल्यन को बढ़ावा देती है, तो अवमूल्यन मुद्रास्फीति को नया ईंधन प्रदान कर देता है। दोनों मिलकर एक ऐसा दुश्चक्र बना देते हैं कि अवमूल्यन से मुद्रास्फीति और मुद्रास्फीति से अवमूल्यन को बढ़ावा मिलने लगता है। हमारा रुपया इसी दुश्चक्र में फंस गया है, जिससे उसे बाहर निकालना आसान नहीं है।

रुपये में गिरावट के अलावा विकास दर में आ रही कमी भी सभी आकलनों को गलत साबित कर रही है। विकास दर में यह कमी राजकोष को बुरी तरह प्रभावित करेगी और केंद्र सरकार द्वारा राजकोषीय नीतियां अपनाकर अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करना लगातार मुश्किल होता जाएगा। राजकोष के बल पर जो जन कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, इससे उनके लिए धन जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा। राजकोष का घाटा तो लगातार बढ़ता ही जा रहा है, यदि हमने घाटे की राजकोषीय नीति का इस्तेमाल कर अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की कोशिश की, तो रुपया देशी और विदेशी, दोनों बाजारों में दम तोड़ता दिखाई पड़ेगा।

सवाल उठता है कि ऐसी परिस्थिति में किया क्या जाए। मुद्रा नीति का इस्तेमाल एक विकल्प हो सकता है। सच कहा जाए, तो हमारे नीति निर्माता पिछले कई वर्षों से महंगाई की समस्या को हल करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा तैयार मुद्रा नीति का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। रिजर्व बैंक ने ऐसी मुद्रा नीति अपनाई है, जिसके जरिये बाजार में रुपये की आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे वह मजबूत बना रहता है। लेकिन यह नीति अपनाने के बावजूद महंगाई पर नियंत्रण नहीं पाया गया। अब रिजर्व बैंक से ऐसी नीति अपनाने को कहा जा रहा है, जिससे बाजार में रुपया ज्यादा सुलभ हो जाए। विकास दर को तेज करने के लिए ही ऐसा कहा जा रहा है।

तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे उद्योगों को बैंकों से ज्यादा पूंजी आसान ब्याज दर पर मिल सकेगी। सीआईआई ने सरकार को यह सलाह देते हुए कहा है कि इससे नौ फीसदी की विकास दर हासिल की जा सकती है। यदि उद्योग क्षेत्र के विकास के लिए ब्याज दर कम की जाएगी, तो जमा पर मिलने वाली ब्याज दर भी कम करनी पड़ेगी। जब मुद्रास्फीति की दर बहुत ज्यादा हो, तब कम ब्याज दर पर निवेशक बैंकों में निवेश क्यों करेंगे? जाहिर है, इससे बैंकों के पास खुद रुपये की कमी की समस्या पैदा हो सकती है और निवेशक सोने या जमीन-जायदाद में निवेश करने को प्रेरित हो सकते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि सोने में किए गए निवेश से अर्थव्यवस्था के विकास को बल नहीं मिलता। विकास दर बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कटौती से महंगाई और अवमूल्यन की समस्या और बदतर हो सकती है। कहां तो हम महंगाई कम करने के लिए ब्याज दर बढ़ा रहे थे और अब विकास दर बढ़ाने के लिए ब्याज दर घटाने पर विचार करें, तो फिर बढ़ती महंगाई पर भी विचार करना होगा। दरअसल काले धन ने हमारे देश के नीति निर्माताओं के नीतिगत विकल्पों को सीमित कर दिया है। ऐसा लगता है कि काले धन की अर्थव्यव्यस्था सफेद धन की अर्थव्यवस्था से काफी बड़ी हो गई है। इसलिए रुपये को बचाना है, तो काले धन की अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाना ही होगा। इसके सिवा शायद ही कोई अन्य विकल्प सरकार के पास रह गया है।

Recommended

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला की खबरों को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें  
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन

Most Read

Opinion

सोशल मीडिया में स्त्री

बांग्लादेश में मेरे जितने आलोचक थे, सोशल मीडिया पर उससे कई गुना अधिक आलोचक हैं। सोशल मीडिया में महिलाओं के साथ जैसा व्यवहार किया जाता है, उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

20 सितंबर 2018

विज्ञापन

Related Videos

अफगानिस्तान ने बांग्लादेश को 136 रन से हराया, सुपर - 4 के मुकाबले आज से

एशिया कप में उलटफेर देखने को मिल रहे हैं। जहां बांग्लादेश ने अपने पहले मैच में श्रीलंका को मात दे दी थी, वहीं दूसरे मैच में बांग्लादेश को अफगानिस्तान के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा।

21 सितंबर 2018

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree