साझा विरासत की अनदेखी

Vinit Narain Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
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भारत के प्रबुद्ध तबके में जब भी आज के निराशाजनक माहौल के बरक्स आशावादी प्रतीकों की चर्चा उठती है, तो हमारा ध्यान बरबस दुनिया की प्राचीनतम विकसित सभ्यताओं में से एक सिंधु घाटी सभ्यता की ऐतिहासिक विरासत की ओर चला जाता है। आगे और बात चली, तो लोग कहेंगे कि देश का दुर्भाग्य, कि इस सभ्यता के अधिकांश पुरातात्विक क्षेत्र (नाम पूछने पर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पर इस सूची का समापन हो जाएगा) पाकिस्तान में चले गए और पाकिस्तानी अपना इतिहास 14 अगस्त1947 से शुरू हुआ मानते हैं, इसलिए इन अवशेषों का कोई नामलेवा नहीं है।
रही-सही कसर इसलाम में मूर्तियों के निषेध की संस्कृति पूरा कर देती है। बड़े से बड़े धर्म निरपेक्षतावादी भी चुनौती के स्वर में कहते हैं कि इन्हीं नीतियों के कारण पाकिस्तान से हमें गर्वित करने वाले पुरातात्विक प्रतीकों की किसी नई खोज की खबर नहीं मिलती है।

जानकार मानते हैं कि लगभग 5,200 साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यता की नींव पड़ी और 13 से 22 शताब्दी पूर्व की अवधि में यह किन्हीं कारणों से नष्ट हो गई। अभी हाल में प्रकाशित एक बहुचर्चित शोधपत्र में इसका कारण बदलते मौसम के कारण वर्षा की पद्धति में आए तेज परिवर्तन थे। दुनिया की करीब दस फीसदी आबादी को समेटे करीब दस लाख वर्ग किलोमीटर में फैली डेढ़ हजार बस्तियां अस्तित्व में थीं, जिनमें से अब तक गिने-चुने क्षेत्र ही सामने आ पाए हैं।

हमें अकसर शिकायत रहती है कि पाकिस्तानी किताबों में सिंधु घाटी सभ्यता के विश्वव्यापी महत्व की अनदेखी की जाती है, पर क्या हमारी किसी किताब में यह पढ़ाया जाता है कि पाकिस्तान में ही पिछले कुछ दशकों में लाखनजोदड़ो और चान्हुजोदड़ो जैसे विशाल नए सिंधुकालीन क्षेत्रों की खोज हुई है?

जैसे चिरपरिचित हड़प्पा के अवशेष अंगरेजों के रेल लाइन बिछाते समय की गई खुदाई से दुनिया के सामने आए, उसी तरह पांच हजार साल पुराना लाखनजोदड़ो भी सिंध प्रांत में नए औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण के दौरान सामने आया। खैरपुर के शाह लतीफ विश्वविद्यालय की शुरुआती दिलचस्पी से वहां एक प्राचीन नगर के अवशेष सामने आए, जिनमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएं मिलीं और यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु नदी मार्ग से यहां से दूर देशों में व्यावसायिक सामग्री का निर्यात किया जाता था। सिंधुकालीन कुछ विशेषज्ञों का तो मानना है कि लाखनजोदड़ो के निवासियों ने ही बाद में जाकर मोहनजोदड़ो नगर का निर्माण किया।

अब तक आईना पश्चिमी उत्पत्ति का सामान समझा जाता था, पर लाखनजोदड़ो में इसके कारखाने के अवशेष मिलने से नए इतिहास का आधार तैयार हो सकता है। इतना ही नहीं, हाल में अमेरिकी विश्वविद्यालयों के एक प्रोफेसर दल का शोधपत्र अर्कियोमेट्री जर्नल में छपा है, जो बताता है कि हड़प्पा और चान्हुजोदड़ो से प्राप्त कुछ धागों पर वैज्ञानिक परीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सिल्क के उद्भव के बारे में चीन के अग्रणी होने की अब तक प्रचलित धारणा पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं और सिंधु घाटी वासियों के सिल्क संबंधी ज्ञान चीन से पुराना न भी माना जाए, तो समकक्ष जरूर माना जाना चाहिए।

स्वीडन के एक शोधार्थी ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त अवशेषों का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि हर दसवां अवशेष किसी न किसी खेल या मनोरंजन से जुड़ा हुआ है...यानी इस क्षेत्र के आम तौर पर आलसी माने जाने वाले लोगों के पूर्वजों के दैनिक जीवन में खेल और मनोरंजन का विशेष महत्व था। इन अवशेषों में दुनिया के सबसे पुराने स्विमिंग पूल के अवशेष भी मिले हैं। शौचालयों की वैज्ञानिक और उन्नत तकनीक के प्रमाण भी यहां से प्राप्त हुए हैं।

1910 में अंगरेज वैज्ञानिक सर क्लाइव कूपर ने बलोच इलाकों की खोज करके डायनासोर जैसे विशालकाय जीव की अस्थियां एकत्र की थीं और अब लुप्त हो चुके इस जीव को बलोचीथेरियम नाम दिया था। 1997 में सर कूपर के बताए इलाकों में फ्रेंच वैज्ञानिक वेलकम फिर से आए और बरसों की खोजबीन के बाद डेरा बुगती इलाके से तीन करोड़ वर्ष पुराने इस जीव के अवशेष खोज निकले और इसके विषद वैज्ञानिक परीक्षण किए।
उनका मानना है कि करीब बीस टन वजन का यह विशालकाय जीव तीन बड़े हाथियों की मिली-जुली ऊंचाई का होता था। पाकिस्तान के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में हाल में ही हमारे इस पूर्वज जीव की प्रतिमा स्थापित की गई है। क्या हमें भारत में रहकर इन नई खोजों से गौरवान्वित महसूस नहीं करना चाहिए?

यदि पाकिस्तान ने सिंधुकालीन स्थलों की सुध नहीं ली, तो भारत ने भी कोई अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाया। देश की राजधानी से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी से जो अवशेष मिले हैं, उनसे पता चलता है कि यह 224 हेक्टेयर में फैला हुआ प्राचीन नगर मोहनजोदड़ो से भी विशाल था, और यह उन दुर्लभ अवशेषों में है, जहां वसासत की तीनों परतें (पुरातत्व की प्रचलित शब्दावली में कहें तो अर्ली, मैच्योर और लेट)स्पष्ट तौर पर मिलती हैं। यानी यह नगर बार-बार बसा और उजड़ा।

अभी मई में ही ग्लोबल हेरिटेज फंड ने इसको भारत की सबसे ज्यादा संकट ग्रस्त संपदा के तौर पर चिह्नित किया है, तब देश के मीडिया का इसकी ओर अचानक ध्यान गया। विकीपीडिया सूचना देता है कि थोड़ी-सी खुदाई के बाद यह काम बीच में इसलिए छोड़ दिया गया, क्योंकि उत्खनन कार्य संपन्न कर रहे सरकारी अमले पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इस बेहद उन्नत नगर से सोना पिघलाने की भट्ठियां, कांसे के सोने और चांदी के काम के बर्तन, तांबे के मछली फंसाने के कांटे, धागे से बुनी हुई वस्तुएं, पशुपालन का प्रमाण देने वेले फॉसिल जैसे महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं।

अनेक पत्रकारों ने वहां सरकारी संरक्षण की बदइंतजामी के बारे में लिखा, पर सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वहां से बहुमूल्य धरोहर निकाल कर औने-पौने दामों पर आसपास के लोग बेच रहे हैं, इसकी सूचना संबद्ध विभाग को देने के बाद उसका टका-सा जवाब मिलना।

सोचने की बात है कि क्या हमारा सिंधुकालीन अतीत अब ऐसी भौजाई की तरह हो गया है, जिसको सीमा के उस पार इसलामी संप्रदायवादी ठोकर मार रहे हैं और इस पार तस्कर भरे बाजार में बेचने को आमादा हैं? किसी को इसके गौरवपूर्ण सम्मान की चिंता नहीं है।

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