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व्यवस्था सुधार के लिए इच्छा चाहिए

Vinit Narain Updated Fri, 24 Aug 2012 12:00 PM IST
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पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने घोषणा की है कि राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए 112 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह घोषणा स्वागतयोग्य है, पर सवाल उठता है कि इस पर कब तक अमल होगा, क्योंकि ज्यादातर घोषणाएं यों ही हवा-हवाई हो जाती हैं।
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राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति यह है कि प्रतिदिन लूटमार, हत्याएं, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, अपहरण, चोरी आदि की घटनाएं देखने-सुनने को मिलती हैं। यह भी सच है कि बहुत कम अपराधी पकड़े जाते हैं और जिन अपराधियों के पीछे धन-बल या सिफारिश होती है, वे कानून की पकड़ से बच जाते हैं। सरकार ने जिन सुरक्षा उपकरणों को खरीदने की घोषणा की है, उनमें नगर निगम वाले शहरों में निगरानी के लिए क्लोज सर्किट कैमरे लगाए जाने की योजना को स्वीकृति दी गई है और तेज गति वाले डीजल वाहनों की खरीद के निर्णय के अतिरिक्त कमिश्नरी स्तर पर पुलिस नियंत्रण कक्ष अपग्रेड किए जाने, निगम वाले शहरों के लिए 200 मोटरसाइकिल और तेज गति से पीछा करने वाले पचास वाहन खरीदे जाने का भी निर्णय लिया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से तेज गति वाले 1,285 मोटरसाइकिल खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।

इसके अलावा रेपिड ऐक्शन फोर्स और अपराध विंग के आधुनिकीकरण, दंगा विरोधी टीम को मजबूत बनाने का भी फैसला लिया गया है। पुलिस स्टेशनों और सिपाहियों की बैरकों को आधुनिक सुविधा संपन्न बनाने का निर्णय लिया गया है। पुलिस जवानों और अधिकारियों के हित में सरकार का यह कदम सराहनीय है। नए जमाने के अपराधियों पर नकेल डालने के लिए नए वाहन, नई एवं आधुनिक मशीनरी खरीदने का विचार अच्छा है। पर सवाल उठता है कि क्या उपकरणों एवं संसाधनों से ही कानून-व्यवस्था में सुधार आ जाएगा।

जिस प्रदेश में पुलिस अधिकारियों को कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने जिले अथवा प्रदेश के राजनेताओं से आदेश लेना पड़ता हो और उन्हीं के निर्देशानुसार केस बनाना अथवा निपटाना पड़ता हो, वहां कानून-व्यवस्था कैसे सुधर सकती है? सचाई यह है कि जो अधिकारी राजनेताओं के अनुसार कार्य नहीं करते, वे अधिक दिन तक अपने उस पद पर नहीं रह सकते, जो सीधे-सीधे जनता से जुड़ा है और जहां अपराध को वश में करने का काम ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा हो जाए, तो जो उपकरण आज पंजाब पुलिस के पास हैं, उसी से अपराध पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि पुलिस बल को आधुनिक उपकरणों और संसाधनों से सुसज्जित किए जाने की जरूरत नहीं है।

पंजाब की जनता ने पिछले वर्षों में काफी कुछ देखा और भोगा है। राज्य के एक योग्य और ईमानदार अधिकारी ने कुछ वर्ष पूर्व जब अपराध रोकने के लिए हाथ बढ़ाया, तो उसके विरुद्ध एक राजनेता ने ऐसा बवंडर उठाया कि उसका तबादला कर दिया गया। मोहाली के मुल्लांपुर में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने नशे का धंधा पकड़ा, अधिकारी ही पीटे गए, पर पुलिस चंडीगढ़ की ओर देखती रही। उन्हें आज तक इस मामले में आगे बढ़ने की इजाजत नहीं मिली। तरनतारन के एक गांव में कन्या भ्रूण हत्या के पूरे प्रमाण मिले, पर बेचारी सिविल सर्जन को मुंह की खानी पड़ी। बलात्कार और देह व्यापार जैसे घिनौने अपराध की शिकार गरीबों की बेटियों को खामोश करवा दिया गया। अजनाला क्षेत्र की एक बेटी ने सामूहिक बलात्कार से दुखी होकर आत्महत्या कर ली, पर सत्ता संपन्न अपराधियों को दंड देना तो दूर, उनका नाम लिखना भी कानून के रक्षकों के लिए असंभव हो गया।

दरअसल पुलिस आज जनता की रक्षक नहीं, बल्कि राजनेताओं की कठपुतली बन गई है। व्यवस्था में सुधार के लिए उपकरण और संसाधनों की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। और पुलिस बल को यह प्रेरणा आदर्श शासक ही दे सकता है।

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