सामाजिक आंदोलनों को मजबूत कीजिए

Vinit Narain Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
पहले असम में, और फिर देश के कई इलाकों में जिस तरह हिंसा भड़की और खासकर दक्षिण भारत से पूर्वोत्तर के लोगों का बहुत बड़ी संख्या में जिस तरह विस्थापन हुआ, यह गहरी चिंता का विषय है। जब यह लग रहा था कि अलगाववादी तत्वों की पकड़ ढीली हुई है, तभी इस तरह की घटनाएं शुरू हो गईं। उत्तर प्रदेश में भी एक के बाद एक सांप्रदायिक तनाव की कई छोटी-बड़ी घटनाएं हो गईं, जिन्होंने इस संवेदनशील और अति महत्वपूर्ण राज्य में सांप्रदायिकता के खतरे को नए सिरे से हवा दी है।

हाल की इन दर्दनाक घटनाओं ने एक बार फिर याद दिलाया है कि अमन-शांति के आंदोलन और अभियानों का निरंतरता से चलना कितना जरूरी है। यह हमारे लोकतंत्र की खूबी है कि यहां जब भी दंगे-फसाद या हिंसा की घटनाएं होती हैं, तब अनेक जन-संगठन और निष्ठावान लोग अमन-शांति के तरह-तरह के प्रयासों के लिए आगे आते हैं। ऐसे प्रयास प्रशंसनीय तो हैं, पर इनकी एक बड़ी कमी प्रायः यह देखी गई है कि इनमें निरंतरता नहीं है। जब हिंसा का माहौल सुधर जाता है, तब इस तरह के प्रयास भी सिमट जाते हैं। चिंता की बात यह भी है कि भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ सामाजिक आंदोलनों की सक्रियता सांप्रदायिक हिंसा के समय नहीं दिखती।

प्रायः यह देखा गया है कि छोटी-छोटी बातों पर हिंसा भड़क जाती है। हिंसक माहौल में तो मामूली अफवाहें भी बड़े विस्थापन की वजह बन जाती है। असम मामले में दक्षिण भारत से पूर्वोत्तर के लोगों के विस्थापन को आखिर क्या कहा जाए? इस तरह के विस्थापन केवल सामाजिक दृष्टि से ही नहीं, आर्थिक नजरिये से भी खतरनाक हैं। जो हजारों लोग रोजगार छोड़कर अपने घर पहुंचे हैं, वे खाएंगे क्या, उनके परिवार की गाड़ी चलेगी कैसे, इस बारे में किसी ने सोचा है?

सचाई तो यह है कि अमन-शांति का आंदोलन यदि निरंतरता से कार्य करे, तो विभिन्न गलतफहमियों या तनाव के वास्तविक कारणों को सुलह-समझौते के माहौल में दूर किया जा सकता है। इस तरह की कोशिशें लगातार चलती रहें, तो कई तरह के सांप्रदायिक मिथकों की असलियत लोगों के सामने रखी जा सकती है। इस तथ्य को तरह-तरह के उदाहरणों से सबके सामने और असरदार ढंग से रखा जा सकता है कि कैसे हिंसा और दंगों से सारे समाज की असहनीय क्षति होती है।

अधिकांश स्थानों पर देखा गया है कि इस तरह का कार्य निरंतरता से नहीं हो पाता है। आग लगने पर तो बुझाने के लिए कई लोग आ जाते हैं, लेकिन आग लगे ही नहीं, इस संभावना को पक्का करने की कोई कोशिश क्यों नहीं होती? यह स्थिति इस कारण और बिगड़ गई है कि जो राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भावना के प्रति प्रतिबद्धता का काम करते हैं, उनके कार्यकर्ता भी निरंतरता से इस मोरचे पर कार्य करते हुए नजर नहीं आते।

चिंता का एक अन्य कारण यह है कि पहले जो जन संगठन इन मुद्दों पर काफी निष्ठा से आगे आते थे, हाल के दौर में ऐसे संगठनों के कार्यकर्ताओं को खुद काफी उत्पीड़न सहना पड़ रहा है। अब पीयूसीएल यानी पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज का ही उदाहरण लीजिए, तो इसके मुख्य पदाधिकारी विनायक सेन की गिरफ्तारी के विरुद्ध बड़ा अभियान चलाना पड़ा और अब इस संगठन की एक अन्य पदाधिकारी सीमा आजाद की रिहाई के लिए अभियान चल रहा है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में हिमांशु शांति आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता थे, पर इस गांधीवादी कार्यकर्ता का आश्रम ही तोड़ दिया गया।

सवाल है कि जो संगठन अमन-शांति के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, उनके मनोबल को तोड़ने का काम क्यों किया जाता है। यह सवाल असम और समूचे पूर्वोत्तर के लिए तो और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वहां अलगाववादी हिंसा के अतिरिक्त तरह-तरह के सामुदायिक, क्षेत्रीय और जातीय तनाव भी हैं। इस माहौल में शांति के लिए निरंतरता से काम करना बड़ी चुनौती है। सरकार कम से कम इतना तो कर सकती है कि अमन-शांति के कार्यकर्ताओं को अपना कार्य निर्बाध ढंग से करने दें। इससे अचानक भड़कती हिंसा, क्षेत्रीय तनाव या विस्थापन पर अंकुश लग सकता है।

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