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जो चुके, उनकी भी जय

Vinit Narain Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
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हमारे ओलंपिक विजेता जब से स्वदेश लौटे हैं, उनके बारे में खबरें छापने और उन्हें ऊंचा स्थान देने को लेकर मीडिया में उन्माद और उत्तेजना का माहौल है। विजय कुमार, साइना नेहवाल, सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त और मैरी कॉम निश्चित रूप से सबकी पसंदीदा हैं, लेकिन क्या सिर्फ जीते खिलाड़ियों का ही गुणगान करना जायज है?
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एक खिलाड़ी होने के नाते ओलंपिक खेलों को मैं हमेशा ही दिलचस्पी के साथ देखता रहा हूं। अपने देश को जीतते देखना हमेशा अच्छा लगता है, चाहे वह जीत किसी भी खेल में क्यों न मिली हो। इन प्रतिभाशाली पुरुष व महिलाओं के विचार वही हैं, जो वास्तव में हर खिलाड़ी महसूस करता है।

मैरी कॉम ने जब यह कहा कि 'मैरी कॉम, मैरी कॉम' और 'इंडिया, इंडिया' की गूंज ने ट्यूनीशिया और पोलैंड के खिलाफ मैच में उन्हें जोश से भर दिया था, तो यह उसी भावनात्मक अभिव्यक्ति का स्वीकार था, जिसे खिलाड़ियों के तौर पर हम सबने कभी न कभी महसूस किया है।

मेरी कॉम ने इसका भी जिक्र किया कि निकोला एडम्स के साथ मुकाबले में किस तरह तमाम चीजें उनके खिलाफ जा रही थीं। दर्शक दीर्घा में हर सीट पर स्थानीय दर्शक मौजूद थे, जो अपने देश के समर्थन के लिए आए थे। यह समझा जा सकता है कि इस तरह के बड़े खेलों में भीड़ की कितनी बड़ी भूमिका होती है। तथ्य यह था कि निकोला के हर कदम पर उनके समर्थकों की खुशी उमड़ रही थी। प्रतिपक्षी मैरी कॉम पर एडम्स के हर प्रहार पर शोर बढ़ता जा रहा था। मुझे लगता है कि मैरी इसके लिए पूरी तरह से तैयार रही होंगी कि वह एक स्थानीय नायिका से लड़ रही हैं। एक खिलाड़ी होने के नाते मुझे पता है कि घरेलू दर्शकों का प्रोत्साहन खेल में कितना मददगार होता है।

अनेक लोग मानते हैं कि घरेलू दर्शकों का प्रोत्साहन ही 2010 के राष्ट्रमंडल खेल में हमारे खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन की मुख्य वजह था। यही स्थिति मैरी के साथ थी। जब भी उन पर प्रहार होता, दर्शक दीर्घा में खुशियां दौड़ जाती थीं, और जब भी मैरी पॉइंट हासिल करती, उनकी हूटिंग की जाती। इसी कारण मुक्केबाजी में सोना हासिल करने की हमारी उम्मीद ध्वस्त हो गई। मुक्केबाजी जैसे खेल में दर्शकों के समर्थन का काफी असर पड़ता है। यह जितना शारीरिक खेल है, उतना ही मनोवैज्ञानिक भी।

लेकिन मैं भारतीय खिलाड़ियों के बीच कराए गए टेन विक्स के सर्वेक्षण से भी सहमत नहीं हो सकता, जिसमें 86 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा है कि बेहतर प्रदर्शन के लिए दर्शकों के समर्थन की जरूरत है। लेकिन मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि गहन तैयारी, बेहतर रणनीति, अच्छी ताकत, जो एक खिलाड़ी कड़े अभ्यास से हासिल कर सकता है, से जीत हासिल की जा सकती है।

साइना नेहवाल ने अपने इंटरव्यू में एक दिलचस्प मुद्दे का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि कैसे जीत के बाद मीडिया द्वारा महत्व देना और चापलूसी हर किसी को अच्छी लगती है। लेकिन दुख तब होता है, जब खिलाड़ियों का उल्लेख केवल उनकी जीत के बाद ही किया जाता है। बाकी समय उन्हें याद भी नहीं किया जाता। यह उस जुनून से बिलकुल अगल है, जो हम क्रिकेटरों को झेलना पड़ता है। क्रिकेटरों पर खेलप्रेमियों की न सिर्फ सर्वाधिक नजर होती है, बल्कि वे हमारी आलोचना भी करते हैं, जिसे उर्दू में नुक्ताचीनी कहते हैं। जाहिर है, खेल पर इसका नकारात्मक असर ही पड़ता है।

सही बात तो यह है कि खिलाड़ियों को सकारात्मक मजबूती और रचनात्मक आलोचना, दोनों की जरूरत होती है। लेकिन इसके विपरीत भारतीय प्रशंसकों के प्यार और नफरत का विरोधाभास कभी-कभी खिलाड़ियों को नष्ट कर देता है और उनकी भावना को मार देता है।

खिलाड़ियों की जीत पर तो वे उन्हें सिर आंखों पर उठा लेते हैं, लेकिन अपेक्षित प्रदर्शन न होने पर उनकी आलोचना करने, यहां तक कि आरोप लगाने में लोग पीछे नहीं रहते। जबकि खिलाड़ियों की भावना जीत, स्वर्ण, रजत या कांस्य पदक के लिए नहीं होती, बल्कि अच्छा और निष्पक्ष खेल खेलने में सक्षम होने के लिए होती है। ओलंपिक में 81 खिलाड़ियों का जो मजबूत प्रतिनिधिमंडल लंदन गया था, उनमें से अधिकतर खिलाड़ी खाली हाथ घर लौटे हैं। जो लोग वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए, वे भुला दिया जाएंगे या शर्मिंदा होने के लिए अभिशप्त होंगे। क्या अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का यही इनाम है?

सच तो यह है कि इन खिलाड़ियों पर ध्यान केंद्रित करना ही उनकी मदद करेगा। अब जो बात मायने रखती है, वह यह कि उन्हें देशवासियों का समर्थन मिलता रहे और लगातार यह बात उनके कानों और दिमाग में गूंजती रहे। क्योंकि यही शोर बाकी सब दर्द और विफलता के गम को भुला देगा और उन्हें अपने आगामी लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध बनाए रखेगा। इसी प्रतिबद्धता के जरिये अगली बार वे बड़ी जीत हासिल करके दिखलाएंगे।

तथ्य यह है कि इस क्षेत्र में कदम रख चुका हर खिलाड़ी जीत के इरादे से ही आया है। मैं कामना करता हूं कि हमारा देश ओलंपिक में भागीदारी कर चुके उन सभी 81 खिलाड़ियों के लिए चीखे, चिल्लाए और विजयघोष करे, ताकि जो हुआ, वे उसे भुलाकर आगे की तैयारी करें कि भविष्य में क्या हो सकता है। उनमें जीतने का जुनून पैदा हो। हमें यह दिखाना है कि हम भारतीय किस तरह अपने चैंपियनों को तैयार करते हैं।

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