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एक बेसहारा और बेचारी क्रांति

Vinit Narain Updated Thu, 23 Aug 2012 12:00 PM IST
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देश के सभी नागरिकों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का सांविधानिक अधिकार है। यह अधिकार उन्हें अप्रैल, 2010 में शिक्षा के अधिकार के तहत दिया गया है। उसी वर्ष पंजाब सरकार ने भी इस अधिकार को स्वीकार करते हुए अपने राज्य में इसे लागू करने की घोषणा की थी। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहिए कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश ने नई पीढ़ी को शिक्षित करने का शोर तो खूब मचाया, लेकिन आंशिक सफलता भी नहीं मिली।
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जब दो बरस पहले यह कानून लागू किया गया था, तो इसका बहुत बड़ा दायित्व निजी स्कूलों पर आ गया था। परंतु निजी स्कूलों ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया। दिल्ली के निजी स्कूलों ने तो इसे लागू करने के लिए दो वर्ष के लिए अदालत से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया।

पंजाब के निजी स्कूल, जो राज्य के अस्सी फीसदी बच्चों को शिक्षा देने के लिए जिम्मेदार हैं, का तेवर भी यही था। इसलिए पंजाब सरकार ने भी इसे दो वर्षों के लिए स्थगित कर दिया। अब वह मियाद पूरी हो चुकी है। अब यह कानून लागू हो जाना चाहिए था, लेकिन निजी शिक्षण क्षेत्र के असहयोग के कारण न तो पंजाब और न ही हरियाणा में यह लागू हो सका है। दिल्ली के स्कूल तो एक बार फिर अदालत की शरण में चले गए हैं। दरअसल, निजी क्षेत्र के असहयोग का असली कारण उनका व्यावसायिक हित है। निजी स्कूल नौनिहालों के अभिभावकों से भारी-भरकम फीस लेकर उन्हें अत्याधुनिक शिक्षा देने का दम भरते हैं।

पंजाब सहित सभी राज्यों में सरकारें चाहती है कि इन सभी स्कूलों में निर्धन और अतिनिर्धन बच्चों के लिए एक चौथाई सीटें आरक्षित कर दी जाएं। निर्धनों के बच्चों को वही शिक्षा मिले, जो पूरी फीस भर सकने वाले संपन्न घरों के बच्चों को मिलती है। निर्धन बच्चों के लिए सीटें आरक्षित करने से इन निजी स्कूलों को जो आर्थिक घाटा पड़ेगा, उसकी भरपाई अपने अनुदान के द्वारा सरकार देगी, लेकिन सरकार के इस आश्वासन पर भरोसा करने के लिए निजी स्कूल तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि पंजाब हो या अन्य राज्यों के निजी स्कूल, कोई भी निर्धन बच्चों के लिए सीटें आरक्षित नहीं कर रहा।

सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक, गरीबी रेखा से नीचे जीने वाली आधी जनसंख्या के बच्चे इन स्तरीय स्कूलों का तो क्या, किसी सरकारी स्कूलों का भी मुंह नहीं देख पाते। केंद्र सरकार और पंजाब की राज्य सरकार शिक्षा क्रांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करती रही है। सर्व शिक्षा अभियान पर पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च कर दिए गए हैं, लेकिन सुचारू रणनीति और पर्याप्त अध्यापकों के कमी से यह योजना विफल होती दिख रही है।

पंजाब सरकार ने दावा किया था कि इस अभियान के तहत राज्य के सभी बच्चों को प्राथमिक स्कूलों में दाखिला दे दिया गया है, लेकिन एक सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ कि आधे छात्र रोजी-रोटी की तलाश में भगोड़े हो गए। अभी पंजाब में शिक्षा की स्थिति पर एक नया सर्वेक्षण सामने आया है, जिसमें पता चलता है कि इस अभियान के तहत स्कूलों में दाखिल बच्चों में से एक लाख के नाम फरजी थे।

इस तसवीर का एक अन्य पहलू भी है, जिसे पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पंजाब में प्रशिक्षण प्राप्त बेरोजगार अध्यापकों का वर्षों से रोजगार के लिए आंदोलन चल रहा है। पंजाब सरकार ने दस हजार नए अध्यापक भरती करने का वायदा किया था, लेकिन बहुत जल्दी यह आंकड़ा पांच हजार पर आ गया।

अध्यापक संगठनों के अनुसार, राज्य में कम से कम 70 हजार प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापक बेरोजगार हैं। इतना ही नहीं, आज भी पंजाब के सरकारी ग्रामीण स्कूलों के पास न तो अपनी इमारत है, न पेयजल की व्यवस्था तथा न ही शिक्षक और किताबें। पंजाब के शिक्षा मंत्री सिकंदर सिंह मलूका आजकल अध्यापकों वाले स्कूलों से वंचित स्कूलों में अध्यापकों की बदली कर रहे हैं। ऐसा प्रयास दो बार पहले भी हुआ है, लेकिन प्रभावित होने वाले अध्यापकों की राजनीतिक पहुंच दीवार बन जाती है। ऐसे में शिक्षा क्रांति बेसहारा हो जाती है और सबको शिक्षा देने का नारा बेमानी लगने लगता है।

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