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लोकतंत्र के नए नवाब

Vinit Narain Updated Mon, 20 Aug 2012 12:00 PM IST
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यह किस्सा इसी जुलाई का है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन और उनके अधिकारी सेना दिवस के समारोह के भाग लेने के लिए जा रहे थे। रास्ते में उन्हें कॉफी पीने का खयाल आया और वह एक कैफे में घुस गए। वहां कुछ भीड़ थी। वहां की महिला बैरे से कैमरन ने पूछा कि क्या कॉफी मिलेगी? उस महिला ने कहा, ‘जरूर, किंतु मैं अभी दूसरों को परोस रही हूं। आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।’ तब कैमरन और उनके साथियों ने खड़े होकर दस मिनट इंतजार किया। फिर भी महिला बैरे ने उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, तो वे दूसरे रेस्तरां में चले गए। वहां उनको पहचान लिया गया और शाही मेहमान की तरह उनका स्वागत हुआ। शीला थॉमस नामक उस महिला बैरे को बाद में पता लगा कि वह प्रधानमंत्री थे, तो उसे पछतावा हुआ। और जब कैमरन लौटकर वहां आए, तो उसने उनसे माफी भी मांगी।
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ब्रिटेन के अखबारों ने इस मामले को रस ले-लेकर छापा और इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर एक प्रश्नचिह्न माना कि साधारण लोग उन्हें पहचानते तक नहीं हैं। एक अखबार ने पूछा कि क्या बात है कि बैरा महिलाएं कैमरन को नहीं पहचानती हैं। इसके पहले भी इटली में एक महिला बैरा ने कैमरन और उनकी पत्नी को यह कहकर परोसने से इनकार कर दिया था कि वह बहुत व्यस्त है।

कैमरन की एक और घटना ब्रिटिश मीडिया में चर्चा और गपशप का विषय बनी। इस घटना के कुछ दिन पहले की यह बात है। कैमरन अपने परिवार और दोस्तों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए। खाना खाकर लौटते समय कैमरन अपनी एक बेटी को वहीं भूल आए। अखबारों ने इसका मजाक उड़ाया और कहा कि ये कैसे माता-पिता हैं, जो बेटी को ही भूल गए। दरअसल हुआ यह कि कैमरन और उनके दोस्तों की कई गाड़ियां थीं। उन्होंने सोचा कि वह किसी और कार में बैठ गई होगी। घर जाकर उन्हें पता लगा और वापस उसे लेने गए। उधर रेस्तरां वालों ने प्रधानमंत्री की बेटी को संभालकर बिठा रखा था।

ब्रिटिश मीडिया ने चाहे जो टीका-टिप्पणी की हो, भारतीय लोगों के लिए इन घटनाओं का मतलब और सबक दूसरा है। प्रधानमंत्री एक साधारण नागरिक की तरह घूमे-फिरे, सड़क किनारे के रेस्तरां में चाय-कॉफी पिए व खाना खाए, साधारण नागरिकों की तरह गलतियां करे और उसके साथ साधारण नागरिक की तरह बरताव हो, भारत में तो इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती।

अपने देश में प्रधानमंत्री तो दूर की बात है, अन्य मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, ऊंचे अफसरों और यहां तक कि जिला कलक्टरों व पुलिस अधीक्षकों के साथ इतना लाव-लश्कर चलता है और उनके इर्द-गिर्द अनुचर और अधीनस्थ कर्मचारियों की इतनी बड़ी फौज रहती है कि ऐसी घटनाएं अपने देश में असंभव हैं। जहां भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति व मुख्यमंत्री जाते हैं, वहां घंटों पहले यातायात रोक दिया जाता है और सुरक्षा के नाम पर जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। भारत के एक साधारण नागरिक के लिए तो इन लोगों से मुलाकात करना भी बहुत मुश्किल है।

पिछले कुछ समय से सुरक्षा के नाम पर यह टीम-टाम और बढ़ गया है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों की सुरक्षा पर इस गरीब देश का अरबों रुपया हर साल खर्च होता है। यह दलील दी जा सकती है कि आतंकवाद का खतरा बढ़ गया है, किंतु क्या यह खतरा ब्रिटेन में नहीं है? ब्रिटेन तो दुनिया भर के आतंकवादियों के निशाने पर ज्यादा है। क्या ब्रिटेन की पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां प्रधानमंत्री की सुरक्षा का इंतजाम नहीं करती होंगी? किंतु सुरक्षा और निगरानी एक बात है और उसके नाम पर राजाओं-महाराजाओं-सामंतों जैसी हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों, नौकरों और जी-हुजुरों की फौज लेकर चलना दूसरी बात है।

भारत में एक गंभीर ‘वीआईपी संस्कृति’ बन गई है। वीआईपी ऐसा शब्द है, जिसे कम पढ़े-लिखे लोग भी समझते हैं। इसकी इतनी आदत हो गई है कि किसी को यह अटपटा नहीं लगता और कोई इस पर सवाल भी नहीं उठाता। यह संस्कृति पुराने सामंती युग और अंगरेजों की गुलामी के काल की विरासत है। गुलाम भारत में वायसराय और अंगरेज अफसर भी राजाओं की तरह रहते थे, जो उनके अपने देश के रिवाज से बिलकुल अलग था। दरअसल एक लोकतंत्र में चुने हुए प्रतिनिधियों तथा साधारण लोगों में इतनी खाई व दूरी लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। एक अन्य यूरोपीय देश नार्वे का प्रधानमंत्री साधारण नागरिकों की तरह गली के साधारण मकान में रहता है और बाजार में खरीदारी करने जाता है।

करीब 50 वर्ष पहले समाजवादी नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने भी ब्रिटेन की एक महिला बैरा से मुलाकात व चर्चा का किस्सा लिखा था। उस महिला बैरे की भारत के बारे में जानकारी, विद्वता और प्रखरता से चकित होकर लोहिया ने पूछा, तो पता लगा कि वह भारत में रह चुके एक ऊंचे आइसीएस अफसर की पुत्रवधु है।

भारत में तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक ऊंचे अफसर के परिवार का सदस्य होटल में बैरे का काम करेगा, किंतु वहां यह आम बात है। इस किस्से को लेकर लोहिया ने भारत की जाति व्यवस्था, सामंती संस्कार, ऊंच-नीच व श्रम के प्रति हिकारत पर चिंतन किया था। 50 साल बाद भारत में हालात सुधरे नहीं, बल्कि कई मामलों में बिगड़े ही हैं। हमने लोकतंत्र के नए नवाब तैयार कर लिए हैं। इस एक और अर्थ में हम आगे जाने के बजाय पीछे जा रहे हैं।

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