बदलाव की पंचायत में उम्मीद की इबारत

Vinit Narain Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
expected changes in the meaning of the Panchayat
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बैंगनी और फिरोजी रंग की जरा हलकी-सी कांजीवरम साड़ी पहने और मोंगरे का गजरा लगाए हुए वह किसी आम दक्षिण भारतीय गृहिणी जैसी लगती हैं। उनके चेहरे की मुसकराहट और आंखों की चमक देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उन्होंने चुनौतियों का पहाड़ लांघा है। बीस बरस पहले महज पंद्रह बरस की उम्र में ब्याह दी गई तीन बच्चों की मां लक्ष्मी के लिए मगर अब पीछे मुड़कर नहीं, आगे देखने का वक्त है। आखिर वह बीते सात वर्ष से सरपंच जो हैं। चेन्नई से पश्चिम की तरफ तकरीबन सवा तीन सौ किमी दूर कृष्णागिरि जिले के केलामंगलम ब्लॉक की जक्कारी पंचायत में वह बदलाव की नई इबारत लिख रही हैं।
चेन्नई और बंगलुरू को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे से होकर जब आप इस पिछड़े गांव तक पहुंचते हैं, तो बदलाव की झलक साफ नजर आती है। यदि सड़कें विकास का पैमाना होती हैं, तो छह-छह नेशनल हाईवे को जोड़ने वाला यह जिला वाकई तरक्की की राह पर है।

वरना यह वह इलाका है, तमिलनाडु की 2004 की मानव विकास रिपोर्ट में जिसे सबसे निचले क्रम में शुमार किया गया था। तब प्रदेश में 30 जिले थे और उस वक्त धर्मपुरी से अलग होकर नया बना कृष्णागिरि जिला इस सूचकांक पर 29 वें नबंर पर था!

नई रिपोर्ट आई नहीं है, लेकिन तय है कि मानव विकास के पैमाने पर अब यह जिला पहले से काफी ऊपर है। यह दावा जक्कारी पंचायत को देखकर किया जा सकता है, जिसकी युवा सरंपच लक्ष्मी लोगों का जीवन स्तर उठाने के लिए एड़ी-चोटी एक किए हुए हैं। वह जब पहली बार सरपंच बनी थीं, तब यह पंचायत कुपोषण, असुरक्षित प्रसव, गरीबी, बेकारी, स्कूल ड्रॉपआउट और बाल विवाह जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। मगर 10 टोले और 1,050 परिवारों की इस पंचायत को अब 'निर्मल ग्राम पंचायत' से नवाजा जा चुका है। 2005 में, यहां 60 फीसदी बच्चे कम वजन की समस्या से जूझ रहे थे, मगर आज सौ फीसदी बच्चे इससे मुक्त हैं। कुपोषण के लिए बदनाम उत्तर प्रदेश और बिहार की पंचायतों के लिए यह सबक हो सकता है। सीखने की बात तो यह भी है कि अब इस पंचायत में सौ फीसदी प्रसव अस्पताल में हो रहा है।

पीपल के विशाल पेड़ के किनारे स्थित पंचायत भवन को इस बदलाव का केंद्र माना जा सकता है, जहां अभी-अभी इस युवा सरपंच ने पंचायत सचिव मंजूनाथ के साथ पंचायत प्रतिनिधियों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सेल्फ हेल्प ग्रुप के प्रतिनिधि और पंचायत के अंतर्गत आने वाले कुछ स्कूलों के हेडमास्टरों के साथ मीटिंग की है। इस बैठक में आठ मुद्दे सामने आए, जिनमें गांव में पीने के पानी से लेकर हेल्थ सब सेंटर के शौचालय और मनरेगा की मजदूरी से जुड़े मुद्दे तक उठाए गए।

यह हर सोमवार को बीडीओ के साथ होने वाली बैठक से पहले की कवायद है, जिसमें इस बैठक के मुद्दे उठाए जाएंगे। और जरूरत पड़ी, तो कलेक्टर से भी मिलेंगे! महज छठी तक पढ़ी-लिखी लक्ष्मी से पूछिए कि बीडीओ और कलेक्टर वगैरह से मिलते हुए झिझक नहीं होती? तो जवाब मिलता है हेड मास्टर चंपक कुमार की ओर से, जो कहते हैं 'वह क्यों डरेंगी, वह जन प्रतिनिधि हैं, उन्हें जनता ने चुना है। डरना तो अफसरों को चाहिए, वह जनता की आवाज हैं।'

यह बैठक पीएलसीसी यानी पंचायत लेवल कंवरजेंस कमेटी की एक कड़ी थी, सरपंच जिसकी धुरी है। यूनिसेफ के जिला समन्वयक जयशंकर बताते हैं कि मई 2007 में कृष्णागिरि जिले में पीएलसीसी की अवधारणा पर पहली बार काम किया गया, जिसके बेहतरीन नतीजे सामने आए हैं। जक्कारी में यह शुरुआत से ही काम कर रहा है। लक्ष्मी इसे पंचायत के सशक्तीकरण में कारगर मानती हैं। पीएलसीसी की बैठकों में शिक्षा से लेकर जन स्वास्थ्य तक पानी और आवास जैसे मुद्दे उठाए जाते हैं और उनका निदान खोजा जाता है।

एक दलित की बेटी लक्ष्मी के लिए यह सब आसान नहीं था, क्योंकि इस इलाके में भी महिलाओं की स्थिति देश के दूसरे क्षेत्रों से अलग नहीं, जहां बेटी को कर्ज माना जाता है। यही वजह है कि उनका ब्याह भी 15 बरस की उम्र में कर दिया गया था। अब वह बताती हैं, ' सरपंच बनने के बाद बीते सात वर्षों के दौरान मैंने चार लड़कियों को बाल विवाह से बचाया।'

असल में 90 के दशक में एक सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ने का अनुभव उनके बड़े काम आया। इसीलिए जब पहली बार सरपंच का चुनाव लड़ने की बात आई, तो उनके किसान पति कृष्णामूर्ति को कोई एतराज नहीं हुआ। वह कहती हैं, मेरे हर काम में अब वह मेरे पीछे होते हैं! अंगरेजी के मुहावरे को उलटते हुए जयशंकर कहते हैं, 'हर सफल महिला के पीछे एक पुरुष जो होता है।'

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