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तो अब मंगल पर नजर है

Vinit Narain

Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
so now is Tue monitor
इस बार प्रधानमंत्री का लाल किले के प्राचीर से भाषण इतना उबाऊ, इतना बोरिंग था कि मेरा ध्यान सोनिया गांधी के चेहरे पर ज्यादा और अपने प्रिय डॉक्टर साहब की बातों पर कम था। दूरदर्शन के कैमरावालों का भी शायद यही खयाल था, तो बार-बार सोनिया जी की तरफ कैमरे घुमा रहे थे। देश की सबसे बड़ी राजनेता प्रधानमंत्री की पत्नी के बगल में बैठी हुई थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब किस्म की कोफ्त दिख रही थी, जैसे सोच रही हों, मेरी तरह िक प्रधानमंत्री को अपने भाषण लिखनेवालों की छुट्टी कर देनी चाहिए। ऐसी बातें मन में आ ही रही थीं, कि प्रधानमंत्री ने चुपके से कह डाला कि उनके मंत्रिमंडल ने हाल में निर्णय लिया है मंगल तक अंतरिक्ष जहाज भेजने का। यह कहने के बाद प्रधानमंत्री ने इतनी जल्दी विषय बदला कि मुझे यकीन होने लगा कि मेरे कानों ने मुझे धोखा दिया है, सो भाषण खत्म होते ही मैंने प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर जाकर उनका भाषण डाउनलोड किया।
भाषण को तीन-बार पढ़ने के बाद भी बड़ी मुश्किल से विश्वास हुआ कि भारत सरकार ने वास्तव में निर्णय लिया है जनता के लाखों करोड़ों रुपये एक नए पागलपन पर खर्चने का। किस वास्ते? किसको दिखाने के लिए? किस आधार पर? इन सवालों के जवाब शायद प्रधानमंत्री के पास भी नहीं होंगे। एक तरफ तो उन्होंने अपने भाषण में खुद कबूल किया कि आधुनिक भारत की 66 वीं वर्षगांठ पर देश का इतना बुरा हाल है कि रोटी, कपड़ा और मकान वाली बुनियादी समस्याओं के अभी तक हल नहीं ढूंढ पाए हैं हम।

दूसरी तरफ मंगल तक पहुंचने के सपने देख रहे हैं हमारे राजनेता। अमेरिका ने अभी कुछ ही हफ्ते पहले मंगल पर उतारा है 'क्युरिओसिटी' नाम का अपना एक अंतरिक्ष यान। तो क्या उनकी नकल करते हुए भारत सरकार ने यह फैसला लिया है? और अगर अमेरिका की नकल करने का इतना शौक है हमारे राजनेताओं को, तो मंगल तक जाने का इरादा मेहरबानी करके फिलहाल त्याग दें और धरती पर देश के आम आदमी को वे सुविधाएं देने की कोशिश करें, जो अमेरिका के आम आदमी को मिलती हैं।

एक छोटी-सी सूची पेश करती हूं इन सुविधाओं की। अमेरिका के आम आदमी की वार्षिक आमदनी भारत के आम आदमी से कोई 30 गुना ज्यादा है। अमेरिका का आम आदमी रहता है पक्के मकान में। झुग्गी बस्तियों में नहीं। वहां अधिकतर बच्चे रात को भूखे नहीं सोते हैं। सुबह उठने के बाद स्कूल जाते हैं गरम-गरम नाश्ता करके और साथ में लेकर जाते हैं दोपहर का खाना।

भारत के बच्चों को उनके गरीब मां-बाप एक प्याली बिना दूध-चीनी की चाय पिलाकर स्कूल भेज देते हैं। जो नसीब वाले हैं, उन्हें एक कटोरी खिचड़ी मिल जाती है। इसलिए कुपोषित हैं भारत के आधे बच्चे। इस शर्मनाक स्थिति में थोड़ा-सा फर्क लाने के लिए बनाई गई है स्कूलों में दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने की योजना। इसके बावजूद हमारे बच्चे पढ़ाई पूरी करने के बाद न तो कहानी पढ़ने के काबिल होते हैं, न साधारण हिसाब करने के। ऐसा अमेरिका में नहीं है, लेकिन फिर भी मंगल तक पहुंचने की योजना बनाने से पहले वहां काफी विचार-विमर्श किया गया।

तो हमारे राजनेता कैसे चल पड़े हैं इस अंतरिक्ष यात्रा पर बिना देशवासियों की बुनियादी समस्याओं का समाधान ढूंढे? शायद इसलिए कि वे उस समाजवादी दौर को भूले नहीं हैं, जिसमें हमने सोवियत संघ को अपना आदर्श बना रखा था। अब तो सोवियत संघ रहा नहीं, लेकिन जब शिखर पर था पूर्व सोवियत संघ के मार्क्सवादी राजनीतिज्ञों का झूठा घमंड, तो उन्होंने भी अपने लोगों को भूखा-नंगा रखकर देश का पैसा खर्च किया चांद तक पहुंचने पर। सोवियत राजनेता दिखाना चाहते थे दुनियावालों को कि उन्होंने जो राजनीतिक आर्थिक रास्ता अपनाया है, वह अमेरिका से बेहतर है। जब सोवियत संघ की पोल खुली 90 के दशक में, तो पता लगा कि बाहर से जो हमने महाशक्ति का रूप देखा था, वह अंदर से बिलकुल खोखला था।

उस जमाने में इंटरनेट नहीं था, तो बहुत देर तक छिपा के रख सका सोवियत संघ अपने राज। आज ऐसा नहीं है। दुनिया जानती है भारत के आम आदमी का हाल, कि 66 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी हमारे राजनेता नहीं दे सके हैं इस देश के लोगों को बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं। दुनिया यह भी जानती है कि अगर हमने करोड़ों रुपये अब बरबाद किए मंगल तक पहुंचने पर, तो सिर्फ इसलिए करेंगे ऐसा कि हम झूठे घमंड की सूराख भरी चादर में छिपाने की कोशिश कर रहे हैं हमारी गरीबी, हमारा यथार्थ।
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