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पैंसठ साल के सफर का हासिल

Vinit Narain Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
sixty five year journey to achieve
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आज के उल्लासपूर्ण दिवस पर यह देखना जरूरी है कि हमारा संविधान, दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाएं तथा नागरिक की हैसियत से खुद हमारा अपना आचरण इस स्वतंत्रता को कितना मजबूत कर रहे हैं, क्योंकि यह शाश्वत सत्य है कि आजादी बनाए रखने की कीमत अनंत सतर्कता है। पिछले छह दशक का अनुभव बताता है कि सरकार की गलत नीतियों या कार्यप्रणाली से जो असंतोष पैदा होता है, उससे प्रभावित होकर हम केवल राजनेताओं से ही नहीं, बल्कि राजनीति से भी हतोत्साहित हो जाते हैं। ऐसे माहौल में सत्ता परिवर्तन की बात तो स्वाभाविक है, पर हम उससे आगे बढ़कर व्यवस्था परिवर्तन की बात भी करने लगते हैं।
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मैं मानता हूं कि एक अल्पावधि के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि या राजनीतिक संस्थापन को व्यवस्था का दरजा नहीं दिया जा सकता, व्यवस्था तो संविधान की पैदावार है। हमारे संविधान ने देश में एक पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक तथा समाजवादी व्यवस्था का प्रावधान किया है। यह भी सही है कि हमारी पंथनिरपेक्षता पश्चिम से उधार ली गई कल्पना नहीं, बल्कि हमारी आदिकालीन परंपराओं में मूलित है, हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषिओं ने कश्मीर की बर्फीली चोटियों से लेकर गंगा तथा गोदावरी के उर्वर मैदानों तक इस सनातन सिद्धांत की उद्घोषणा की थी कि 'सत्य एक है और जानने वाले उसको अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।'

हमारे संविधान निर्माता केवल विधि विशेषज्ञ नहीं थे, बल्कि वे लोग थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। इनके लिए भारत केवल एक भूभाग का नाम नहीं, बल्कि एक विचार, आस्था और दैविक शक्ति का पर्यायवाची था। यह नेतृत्व जमीनी वास्तविकताओं से परिचित था। वे जानते थे कि सामाजिक ऊंच-नीच, सांप्रदायिक खाई तथा आर्थिक दरिद्रता हमारे जीवन की वास्तविकता है, पर उनकी महत्वाकांक्षा थी कि आजाद भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरे, जहां सामाजिक विषमता, सांप्रदायिकता तथा गरीबी इतिहास बन जाएं और हम अपनी राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करते हुए देश के विकास का मार्ग प्रशस्त करें। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जिस व्यवस्था की आवश्यकता थी, उन्होंने उसका प्रावधान हमारे संविधान में किया है।

इन भावनाओं को पंडित नेहरू ने सुंदर शब्दों में इस तरह अभिव्यक्ति दी, 'भारत की सेवा अर्थात् उन करोड़ों भारतीयों की सेवा, जो पीड़ित हैं। इसका अर्थ है गरीबी, अशिक्षा, रोग और अवसर की असमानता की समाप्ति।' संविधान निर्माताओं ने इस व्यवस्था को जिन स्तंभों पर खड़ा किया था, वह सभी सूक्ष्म रूप में संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हैं। निश्चय ही अगर संविधान में मूल अधिकारों का अध्याय न होता, तो भी इन सभी अधिकारों को प्रस्तावना के माध्यम से सुनिश्चित किया जा सकता था।

जरा गौर कीजिए क्या गूंजदार शब्द हैं, जहां समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्ति के लक्ष्य के साथ, नागरिकों में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता पैदा करने की बात की गई है। यहां प्रश्न यह है कि अगर हम वह सब करने में विफल रहे हैं, जिसका प्रावधान हमारे संविधान में है, तो दोष किसका है, संविधान का या स्वयं हमारा?

डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान को अंगीकृत करते समय अपने भाषण में कहा था, 'मैं मानता हूं कि यह संविधान व्यावहारिक है, इसमें वांछित लचीलापन है और इसमें देश को शांति तथा युद्ध, दोनों ही परिस्थतियों में इकट्ठा रखने की क्षमता है। इसी के साथ मैं कहूंगा कि अगर संविधान लागू होने के बाद स्थिति खराब होती है, तो उसका कारण यह नहीं होगा कि संविधान दोषपूर्ण है, बल्कि उस स्थति में एक ही बात कही जा सकेगी कि इसके लिए मानवीय दुष्टता दोषी है।'

शायद यह इसी दुष्टता का परिणाम है कि संविधान ने हमें लोकतंत्र दिया है, लेकिन हमने इसे लगभग राजवंशीय परंपरा में बदल दिया है। संविधान धर्म, जाति, लिंग, भाषा तथा जन्माधारित विभेद को निषेध घोषित करता है, पर ज्यादातर राजनीतिक दल समुदायों, जातियों तथा विशेष अधिकारों के प्रवक्ता बन गए हैं। संविधान पिछड़े और कमजोर वर्गों के हितों के संरक्षण और संवर्द्धन का प्रावधान करता है, हमने बिना किसी हिचक के वर्गों की जगह जातियों और धार्मिक समुदायों को प्रतिस्थापित कर दिया है।

संविधान समाज कल्याण की दृष्टि से बेकारी, वृद्धावस्था, बीमारी इत्यादि के मामलों में सहायता पाने का प्रावधान करता है, हम राजनीतिक कारणों से एक वृद्ध महिला को अदालत से मिली सहायता को खत्म करने में भी कोई शर्म महसूस नहीं करते।

हमने बहुत बार व्यवस्था बदलने की बात की है। आंदोलन कामयाब भी हुए हैं, पर तजुर्बा यह बताता है कि सरकार में आने के बाद व्यवस्था बदलने की बात करने वाले स्वयं बदल गए। जैसा एक शायर ने कहा है- भेजा था मैंने अपनी तरफ से उन्हें वहां/ वो भी तो जाके उनके तरफदार हो गए।
मैं मानता हूं कि जरूरत अपने दृष्टिकोण और मानस को बदलने की है, जरूरत अपने आचरण को संविधान सम्मत करने की है, जिससे निश्चित ही हम स्वतंत्रता के साथ एक बेहतर भविष्य की तरफ आगे बढ़ सकेंगे।

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