श्री अरविंद के सपनों का भारत

Vinit Narain Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
sri Aurobindo indias dream
महर्षि अरविंद भारतीय राजनीति यानी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में 1905 से 1910 तक केवल पांच वर्ष रहे और इतनी अल्पावधि में देश के जनमानस को इतना समर्थ बना दिया कि वह अपनी वास्तविक हस्ती को पहचान सके और अपने अतीत की खोई गरिमा और महिमा को पुनः अर्जित कर सके।

जब वह इंग्लैंड में 14 वर्षों तक अध्ययन करने तथा आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण किंतु घुड़सवारी में जानबूझकर विफल रह जाने के बाद भारत लौटे और बड़ौदा राज्य की सेवा का दायित्व संभाला, तब उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि तत्कालीन कांग्रेस नेता अंगरेजों से याचक की तरह आजादी की मांग कर रहे थे। उन्होंने कांग्रेस की स्वाधीनता संग्राम की नीति की कड़ी आलोचना करते हुए मुंबई से प्रकाशित इंदु प्रकाश में लिखा, ​'मैं कांग्रेस के बारे में कहता हूं कि इसके उद्देश्य भ्रांतिपूर्ण हैं, कि इसकी उपलब्धि के पीछे की भावना में सचाई और एकनिष्ठता का अभाव है। और इसके तरीके सही नहीं हैं तथा जिन नेताओं में इसे विश्वास है, वे नेतृत्व के योग्य सही व्यक्ति नहीं हैं।'

श्री अरविंद केवल सात वर्ष की उम्र में ही इंग्लैंड चले गए थे, इसलिए वह अपनी मातृभाषा बांग्ला सहित अन्य भारतीय भाषाओं तथा भारतीय संस्कृति, धर्म और परंपरा सबसे अनजान थे। जब उन्होंने बड़ौदा काल में पहली बार अपने देश की प्राचीन संस्कृति, प्राचीन भाषा संस्कृत तथा प्राचीन साहित्य का अध्ययन किया, तब उन्हें यह देखकर आश्चर्य और दुख हुआ कि अतीत का इतना समृद्ध, समर्थ और ज्ञानी देश बाहरी क्षुद्र शक्तियों का दास कैसे बन गया? उन्होंने देश के पुनरुत्थान के लिए बड़ौदा राज्य की सेवा से मुक्ति ले ली और देश के स्वाधीनता आंदोलन में अपने को पूरी तरह झोंक दिया।

बड़ौदा राज्य की सेवा से मुक्त होने के बाद वह देश की सक्रिय राजनीति में खुलकर भाग लेने लगे और कांग्रेस में शामिल हो गए। उनके ओज भरे भाषणों तथा आग्नेय लेखों ने सोए देश में मानो प्राण फूंक दिया। लाला लाजपत राय उत्तर भारत का नेतृत्व कर रहे थे, बाल गंगाधर तिलक महाराष्ट्र के प्रमुख नेता थे और बंगाल का नेतृत्व विपिनचंद्र पाल के हाथ में था। श्री अरविंद ने पुराने आंदोलन को एक नई दिशा दी।

उन्होंने स्वाधीनता के लिए पुरानी और मंद शैली 'प्रेयर ऐंड पेटिशन' के स्थान पर अपनी भूमि पर अपना प्रशासन हर देशवासी का कर्तव्य और दायित्व बनाया। उनकी इस प्रखर भावना की तीनों दिग्गज नेताओं ने सराहना की। आंदोलन को अधिक तेज करने की दृष्टि से बंगाल में विपिनचंद्र पाल ने वंदे मातरम् नाम का एक अंगरेजी दैनिक निकाला और उसका संपादकीय भार श्री अरविंद को सौंप दिया।

उन्होंने यूरोप में अपने अध्ययन काल में वहां के इतिहास और उनके मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन किया था। भारत आने पर भारत के समृद्ध अतीत और वर्तमान तामसिक स्थिति को भी निकट से देखा। इन दोनों के परिप्रेक्ष्य में स्वाधीनता संग्राम की जो रणनीति उन्होंने अपनाई, वह त्रिविध योजना उनके अपने मौलिक चिंतन का ही परिणाम थी।

श्री अरविंद आरंभ से ही बिलकुल भिन्न और मौलिक चिंतक थे। उनकी राजनीति राष्ट्रनीति थी। वह भारत को भारत के वास्तविक स्वरूप में देखना चाहते थे। उनका विश्वास था कि यदि भारत अपनी लुप्त प्राचीन आध्यात्मिक महानता, प्राचीन आर्यों की सर्वसमावेशी आत्मिक और भौतिक उदात्त श्रेष्ठता पुनः प्राप्त कर ले, तो वह विश्व गुरु बन जाएगा।

उन्होंने वंदे मातरम् के संपादकीय लेख में 'भारतीय पुनरुत्थान तथा यूरोप' शीर्षक के अंतर्गत लिखा, 'यदि भारत यूरोप का बौद्धिक उपनिवेश बन जाता है, तब वह कभी भी अपनी स्वाभाविक महानता को अर्जित नहीं कर सकता या अपनी अंतर्निहित संभावना को परिपूर्ण नहीं कर सकता... जब भी, जहां भी, किसी राष्ट्र ने अपनी सत्ता का प्रयोजन त्याग दिया, तब उसकी संवृद्धि रुक गई। भारत को भारत ही रहना होगा, यदि इसे अपनी नियति का पालन करना है। और न ही यूरोप को भारत पर अपनी सभ्यता थोपकर कुछ लाभ होगा, क्योंकि यदि भारत, जो यूरोप की बीमारियों का वैद्य है, स्वयं रोग की पकड़ में आ जाए, तो रोग ठीक नहीं हो पाएगा....।'

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