माथेरान रेल

Vinit Narain Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
matheran railway
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खूबसूरती में कई अन्य रेल सेवाओं को मात देने वाली माथेरान रेल लाइन अपने नाम को लेकर सुर्खियों में है। असल में केंद्र सरकार ने इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने को लेकर एक प्रस्ताव यूनेस्को को भेजा था, पर इसके संस्थापक रहे सर आदमजी पीरबोय के पौत्र ने इसका नाम पीरबोय के नाम पर करने की मांग की है, और अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
माथेरान रेल महाराष्ट्र की हैरिटेज रेल सेवा है, जिसका निर्माण अब्दुल हुसैन आदमजी ने करवाया था। उनके पिता सर आदमजी पीरबोय अकसर माथेरान जाया करते थे और रास्ते में आने वाली दिक्कतों से पार पाने के लिए वह माथेरान तक रेल लाइन बिछाना चाहते थे। इसे बनाने में करीब 16 लाख रुपये खर्च हुए। वर्ष 1900 में इसे बनाने की योजना बनी और 1904 में इस दिशा में काम शुरू हो गया। बार्सी लाइट रेलवे के इंजीनियर एवेरार्ड कॉलथ्रोप की भी मदद ली गई। करीब 20 किलोमीटर लंबी रेल लाइन को यातायात के लिए 1907 में खोल दिया गया।

इस लाइन पर ट्रेनों की अधिकतम रफ्तार 20 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक नहीं होती और रास्ते में खूबसूरत पहाड़ तथा कई झरने भी आते हैं। यही वजह है कि नैरो गेज पर चलने वाली इस रेल को पर्यटक खूब पसंद करते हैं। हालांकि शुरुआती वर्षों में बरसात के मौसम में भूस्खलन के डर से इसे बंद कर दिया जाता था, पर बाद में ऐसा करना बंद कर दिया गया।

वैसे पिछले वर्ष भी इसे कुछ महीनों के लिए बंद किया गया था। दिलचस्प यह भी है कि इसकी राह में एक छोटी-सी गुफा आती है, जिसे 'वन किस टनल' कहा जाता है। इसका नाम इसलिए वन किस रखा गया है, क्योंकि यह इतनी छोटी है कि इसमें एक चुंबन लेने भर का समय होता है।

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