मजदूर तो पहले ही मोबाइल है

Vinit Narain Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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आलोचना के 'अर्क' से राजनीति के अंधे अंतरिक्ष में तलवार भांजने वालो, अगर इस देश में ऋषि चरक जिंदा होते, तो वह आत्महत्या जरूर कर लेते। पत्थरों का अर्क निकालने की कला, जो इस दौर के विपक्षी नेताओं के पास है, वह चरक मुनि के पास नहीं थी। सरकार गरीबों को मोबाइल दे रही है, तो आप ‘मंथरा’ क्यों हुए जा रहे हैं। यह कलियुग है। यहां चोरी करने वाला अपराधी नहीं माना जाता, बशर्ते वह अपने मूल कार्य को कठिन परिश्रम से तय करते हुए ‘साइड बिजनेस’ के रूप में चोरी को अपनाए।
डकैती डालना त्रेतायुग में भी पाप था और इस युग में भी पाप माना गया है। पाप करने वाले अफसरों को मंत्री, बाबुओं को अफसर, चपरासियों को बाबू तथा आम आदमी को पुलिस सजा जरूर देगी। विपक्ष के हाय-तौबा करने पर सरकार अपने मापदंड बदलने वाली नहीं है। सबसे ऊपर है विकास, बाकी चीजें उसी से निकलती हैं। विकासहीन देश में चोरी-डकैती की आशंकाएं बनती ही नहीं। मोबाइल फोन विकास का पर्याय माना गया है।

विपक्षी दलों को मोबाइल का अर्थ मालूम ही नहीं है, वरना मोबाइल को लेकर इतनी हाय-तौबा नहीं करते। इस देश में न तो उच्च वर्ग मोबाइल की श्रेणी में आता है और न मध्यम वर्ग। मोबाइल की श्रेणी में गरीब तबका आता है, जिसके लिए मोबाइल जरूरी है। उच्च और मध्यम वर्ग के चार पहिया वाहनों में इंटरनेट की सुविधा मौजूद है, अतः उनके लिए मोबाइल फोन का होना, न होना बराबर है। मगर गरीब तबका, जो मजदूरी के लिए शहर-दर-शहर मोबाइल बना रहता है, उसके लिए मोबाइल फोन बहुत जरूरी है।

मजदूर जब रोटी का टिफिन साथ लेकर मजदूरी पर जाता है, तब उसे यह पता नहीं होता कि आज मजदूरी किस दिशा में मिलेगी। कुल मिलाकर उसके कार्यस्थल की अनिश्चिता के चलते ही उसे मोबाइल फोन की आवश्यकता है। संवाद से मानसिक तनाव कम होता है और पेट की आग की ओर ध्यान नहीं जाता।

मोबाइल फोन का एक फायदा यह होगा कि मजदूर अलग-अलग शहरों में मजदूरी के रेट मालूम कर सकेंगे। मनरेगा योजना में होने वाले भुगतान के बारे में बैंक और शोषण करने वाले अधिकारियों से बात करके कम मिलने वाली रकम के कारणों को जान सकेंगे। हां, एक बात और, मोबाइल मिलने के बाद कोई गरीब वोट डालने से बच नहीं पाएगा। नेता लोग उसकी लोकेशन लेकर उसे मतदान केंद्र तक जबरन ले आएंगे।

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