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आत्मीय हिंसा का शिकार बच्चे

Vinit Narain

Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
Intimate Violence Child Victim Rebuke Reproach Degrade
बच्चे को डांटना, निरंतर उलाहना देना या उसे नीचा दिखाना और उसे शारीरिक तौर पर प्रताड़ित करना, के बीच क्या कोई समानता ढूंढ़ी जा सकती है? इन दोनों किस्म की प्रताड़नाओं के शाब्दिक एवं शारीरिक असर को लेकर अमेरिकन एकेडेमी ऑफ पीडियॉटिक्स का अध्ययन गौरतलब है। पेडियॉटिक्स नामक जर्नल में प्रकाशित उपरोक्त अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि दोनों का प्रभाव एक-जैसा ही होता है। मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैकमिलन की अगुवाई में हुए इस अध्ययन के मुताबिक जब आप बच्चे पर हर रोज चिल्लाते हैं और यह बात प्रकट करते हैं कि वह बालक ‘आफत का सबब’ है, तो इसका बेहद विपरीत प्रभाव पड़ता है।
एक अन्य अध्ययन के मुताबिक अधिकतर अमेरिकी मां-बाप अपने बच्चों को शारीरिक ढंग से अनुशासित करते हैं : 63 प्रतिशत मामलों में माता-पिता 1-2 साल के बच्चे को शारीरिक सजा देते हैं, तो किशोरों के मामले में यह अनुपात 85 फीसदी तक पहुंचता है। वैसे वहां थप्पड़ का ‘प्रसाद’ स्कूलों में अब भी विद्यमान है। अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी में बाल मनोविज्ञान के प्रोफेसर ने स्लेट पत्रिका में इस पर विस्तार से लिखा था। दो साल पहले ह्यूमन राइट्स वॉच और अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन ने एक साझा रिपोर्ट जारी करके बताया था कि लगभग दो लाख बच्चे अमेरिकी स्कूलों में थप्पड़ खाए हैं। यहां तक कि अमेरिका के 21 राज्यों में आज भी कॉर्पोरल (दंडात्मक) सजा कानूनन वैध है।

एक वक्त था जब बच्चे को पीटना स्वाभाविक समझा जाता था, यहां तक कि यह मुहावरा भी प्रचलित था कि ‘स्पेअर द रॉड आर स्पाइल द चाइल्ड’ अर्थात ‘डंडे के बिना बच्चे की बरबादी तय’। और आज आलम यह है कि 113 मुल्कों ने स्कूलों में किसी भी किस्म की दंडात्मक सजा पर रोक लगा दी है, जबकि 29 देश ऐसे हैं, जिनमें स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, बुल्गारिया, यूनान, हंगरी, पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश शामिल हैं, जहां माता-पिता या अन्य नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा संतानों को थप्पड़ मारना तक गैरकानूनी है।

आखिर ऐसे क्या कारण गिने जाते हैं, जिसकी वजह से लोग उसूलन बच्चों के साथ शारीरिक या अन्य किस्म की हिंसा के खिलाफ होते हैं। ‘टेन रिजंस नॉट टू हिट योर किड्स’ में इयान हंट ऐसे कारणों की चर्चा करते हैं। उनके मुताबिक, बच्चों को मारना एक तरह से उन्हें यह प्रशिक्षण देता है कि वह खुद भी बड़े होकर ऐसा करें।

यह समझने की हमेशा आवश्यकता है कि कई मामलों में बच्चे द्वारा 'गलत आचरण' के पीछे एक तरह से उसकी बुनियादी जरूरतों की उपेक्षा का तत्व शामिल रहता है। खाना-पीना, नींद आदि के अलावा उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता होती है कि माता-पिता का ध्यान उससे न बंटे। बच्चे को सजा देकर हम किसी विवाद के प्रभावी एवं मानवीय ढंग से हल करने से उसे दूर धकेलते हैं। सजा प्राप्त बच्चा एक तरह से गुस्से की भावना और बदलाव की फंतासी में उलझा रहता है, जिसकी वजह से किसी समस्या के समाधान के अधिक प्रभावी तरीके को ढूंढ़ने से वह वंचित रह जाता है।

संयुक्त राष्ट्र ने माता-पिता के हाथों कॉर्पोरल सजा को खत्म करने के लिए 2009 की सीमा मुकर्रर की थी, पर समय सीमा समाप्त होने के बाद भी कई देशों ने इस मामले में निर्णायक कदम नहीं उठाए हैं। कुछ समय पहले भारत के महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की तरफ से एक बिल का मसौदा पेश किया गया था, जिसके मुताबिक संस्थानों में ही नहीं, बल्कि माता-पिता, रिश्तेदारों, पड़ोसियों के हाथों कार्पोरल सजा को दंडनीय अपराध घोषित करने की बात कही गई थी।

मुमकिन है, जब यह विधेयक कानून बनने की ओर बढ़ेगा, तो इसका विरोध किया जाएगा। इतिहास के ईमानदार प्रेक्षक इस बात को पहचानते हैं कि मानवाधिकार के हर पहलू में प्रगति के साथ इसी किस्म का शोरगुल होता है। यह अकारण नहीं कि महान शिक्षाविद् जॉन होल्ट ने लिखा है, 'जब हम बच्चे को डराते हैं, हम सीखने की उसकी प्रक्रिया को अधबीच में ही खत्म कर देते हैं।'
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