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प्रेमचंद की पत्रकारिता के सरोकार

Vinit Narain Updated Mon, 30 Jul 2012 12:00 PM IST
Premchand Journalism Fairness Concerns Opinion
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भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय प्रेमचंद उन चंद पत्रकारों में से थे, जिन्होंने असहमति का साहस और सहमति का विवेक विकसित करने के लिए समाज की कुरूपता की पहचान तो की ही, जनशक्ति को संगठित करने के लिए पत्रकारिता की उज्ज्वल मशाल भी जलाई। उनकी पत्रकारिता निष्पक्षता और साहसिकता के साथ जनमत निर्माण का दस्तावेज है।
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प्रेमचंद ने आज से लगभग एक शताब्दी पहले (1905) जमाना में देशी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है, शीर्षक से लंबी टिप्पणी लिखी थी। वह टिप्पणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि स्वदेशी का अलख जगाने वाले और समाजवाद को ओढ़ने-बिछोने वाले, दोनों बराबर दूरी पर खड़े हैं, इसलिए खुली अर्थव्यवस्था और विनिवेश का अश्वमेघ जारी है। प्रेमचंद की पत्रकारिता इस अश्वमेघ के खिलाफ ललकार है। सांप्रदायिकता की विष बेल के खिलाफ तो वह शुरू से रहे ही।

प्रेमचंद के पत्रकार-रूप और पत्रकार-कला की चर्चा उनके कथाकार रूप की अपेक्षा कम हुई है, जबकि तीन दशक तक वह पत्रकारिता जगत में छाए रहे। स्वदेश, आज, मर्यादा आदि पत्रों से वह संबद्ध रहे और असहयोग आंदोलन के जमाने में स्तंभकार के रूप में ख्यात थे। प्रेमचंद ने सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान किसी भी राजनेता से कम नहीं ठहरता। अपने समय की राजनीतिक घटनाओं पर प्रेमचंद की जागरूक निगाह बराबर बनी रही और उन घटनाओं पर वह निरंतर निर्भीक संपादकीय टिप्पणियां लिखते रहे।

स्वराज और साम्राज्यवादी शोषण के प्रश्न पर उनका चिंतन अपने समय के राष्ट्रीय नेतृत्व से आगे बढ़ा हुआ था। 'जिस दिन से भारतीय बाजार में विलायती माल भर गया, भारत का गौरव लूट गया', इस बात की प्रेमचंद ने न केवल पहचान की, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अनवरत संग्राम भी किया। स्वराज मिलकर रहेगा (मई 1931) दमन की सीमा (अप्रैल 1932), काले कानूनों का व्यवहार (जनवरी 1933), शक्कर पर एक्साइज ड्यूटी (जुलाई 1933), कोढ़ पर खाज (जून 1935) जैसे शीर्षक से लिखी गई टिप्पणियां उनकी उपनिवेशवाद विरोधी चेतना के प्रमाण हैं। उनकी संपादकीय तटस्थता को जैनेन्द्र जी ने 'ममताहीन सद्भावना' कहा है।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण में जब राष्ट्रवादी चिंतन अsपने उभार पर था, तब ब्रिटिश सरकार ने 1910 के प्रेस ऐक्ट की धाराओं को पुनर्जीवित कर, बल्कि पहले की अपेक्षा और अधिक बर्बर बनाकर न्यू इंडियन प्रेस आर्डिनेंस, 1930 पास किया, तो इस सरकारी दमन नीति का तीव्र विरोध सबसे पहले प्रेमचंद ने किया। उन्होंने लिखा, 'स्वेच्छाचारी सरकारों की बुनियाद पशुबल पर होती है। वह हर एक अवसर पर अपना पशुबल दिखाने का तैयार रहती है... यह बिलकुल नया अविष्कार है और इसके लिए इंग्लैंड और भारत, दोनों ही सरकारों की जितनी प्रशंसा की जाए, वह थोड़ी है। अब न कानून की जरूरत है न व्यवस्था की, काउंसिलें और असेंबलियां सब व्यर्थ, अदालतें और महकमें सब फिजूल। डंडा क्या नहीं कर सकता- वह अजेय है, सर्वशक्तिमान है।' प्रेमचंद का हंस भी इस सरकारी दमन का शिकार हुआ और अपनी विरोधी चेतना की कीमत उन्हें पत्र बंद कर देने के रूप में चुकानी पड़ी।

प्रेमचंद ने पत्रकारिता को मिशन माना, फैशन या व्यवसाय नहीं। वह पत्रकारिता में पूंजी के प्रभुत्व और सस्ते प्रचारतंत्र के सख्त विरोधी थे। प्रेमचंद ऐसे पत्रकार न थे, जो पत्रकारिता की आर्थिक विवशता को सिद्धांतों की कुरबानी देकर विज्ञापनों की बलशालिता के आगे नतमस्तक हो जाते, बल्कि वह ऐसे पत्रकार थे, जो सनसनीखेज खबरों और व्यावसायिक हितों को तरजीह न देकर पत्रकारिता को बुनियादी सवालों से जोड़ना चाहते थे। आज अस्सी-पच्चासी साल बाद यदि सत्ता प्रतिष्ठान और आधुनिक संसाधनों से पालित पत्रकारिता में वह आदर्श-मानदंड और जज्बाती भावना नहीं है, तो इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि आज आधुनिक चमक-दमक वाली पत्रकारिता को प्रेमचंद की पत्रकारिता विमर्श से बहुत कुछ सीखना शेष है।

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