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मैगसायसाय विजेता 'अज्ञात' योद्धा

Vinit Narain

Updated Fri, 27 Jul 2012 12:00 PM IST
Magsaysay winner Kulandei Francis
गरीबी से तपने वाले बचपन में सामाजिक बदलाव की कितनी भूख होती है, इसे कुलांदेई फ्रांसिस से बेहतर शायद ही कोई बयां कर पाए। विपन्नता की वजह से न जाने कितनी रात वह भूखे सोए होंगे, पर आज वह कई परिवारों की रोजी-रोटी का आधार बन चुके हैं। एकीकृत ग्रामीण विकास परियोजना के तहत सूखी धरती की प्यास बुझाने का काम हो, या फिर महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता का पाठ पढाना, कुलांदेई अपने मिशन में निर्लोभ भाव से लगे हुए हैं। पर अब यह 'अज्ञात' योद्धा विश्व प्रसिद्ध हो गया है। इस बार के रमन मैगसायसाय पुरस्कार विजेता एकमात्र भारतीय कुलांदेई फ्रांसिस ने साबित किया है कि महानता की राह में गरीबी बाधक नहीं बन सकती। ग्रामीण जीवन की बदहाल दशा को बदलने के इसी जज्बे ने ही उन्हें उन छह शख्सियतों में शुमार किया है, जिन्हें इस बार यह विश्व प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है।
उनका अब तक का सफर काफी उतार-चढ़ाव का रहा है। खेतिहर मजदूर के घर जन्मे कुलांदेई अपने परिवार के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं, जिन्होंने स्नातक की डिगरी हासिल की। उनकी यह शिक्षा भी कर्ज लेकर पूरी हुई। स्नातक के बाद नौकरी करने के बजाय भूख, त्रासदी और प्रवास से जूझ रहे लोगों के लिए उन्होंने कुछ करने की ठानी और जुड़ गए बंगलुरु की होली क्रॉस सोसाइटी से। कुलांदेई बताते हैं, घने जंगलों में 20-20 किलोमीटर तक जाकर संगठन का काम करना, वह भी दुर्गम रास्तों पर, आसान नहीं था। पर जब एक बार समाज सेवा का नजरिया स्पष्ट हो गया, तो इस सोसाइटी को छोड़कर मैंने तमिलनाडु के कृष्णागिरी से एकीकृत ग्रामीण विकास परियोजना की नींव रख दी।

शुरुआत में कुलांदेई ने सूखे पर ध्यान लगाया। उनके ही प्रयास का नतीजा है कि आज कृष्णागिरी, धरमपुरी और वेल्लूर जिले में 300 से अधिक छोटे-छोटे बांध बने हैं। पर कुलांदेई की यह अंतिम मंजिल नहीं थी। 'सामुदायिक भावना में विश्वास बहाल करते हुए आर्थिक रूप से अधिकारसंपन्न बनाने के लिए' उन्हें काम करना था। बस महिलाओं के स्वयं सहायता समूह की नींव पड़ गई। आज 8,500 से अधिक ऐसे समूह यहां काम कर रहे हैं, जिससे लाखों परिवारों की महिलाएं जीविकोपार्जन कर रही हैं। ग्रामीण जीवन में इस 'मूक' परिवर्तन के अग्रणी कुलांदेई पुरस्कारों में यकीन नहीं रखते। बधाई वह स्वीकारते तो हैं, पर विनम्रता से कहते हैं कि स्थानीय लोगों को मेरा काम संतुष्ट कर रहा है, बस यही मेरा पुरस्कार है।
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