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उच्च शिक्षा की बिगड़ती सेहत

Vinit Narain Updated Fri, 20 Jul 2012 12:00 PM IST
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Prime Minister Manmohan Singh Higher education Level of education
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करीब पांच साल पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उच्च शिक्षा के हालात पर चिंता जताते हुए कहा था कि देश में दो-तिहाई से ज्यादा विश्वविद्यालयों और 90 फीसदी से अधिक डिगरी कॉलेजों में शिक्षा का स्तर औसत से काफी कम है। इसके लिए जहां उन्होंने गुणवत्ता के मानकों पर चोट की थी, वहीं इस बात को भी रेखांकित किया था कि हमारे विश्वविद्यालयों द्वारा अपनाई जाने वाली चयन प्रक्रिया में खोट है, और यहां तक कि मनमानी और भ्रष्टाचार के अलावा जातिवाद और सांप्रदायिकता के समीकरण भी हावी रहते हैं।
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आज पांच साल बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। बेशक उच्च शिक्षा के मानदंडों के लिहाज से हम पूरी दुनिया में अमेरिका के बाद नंबर दो पर जाने जाते हैं। लेकिन इसकी लगातार नीचे जाती गुणवत्ता ने चिंतकों के माथे पर बल ला दिए हैं। दरअसल, उच्च शिक्षा की बदहाली की कई वजहें हैं। कहीं शिक्षकों के चयन में पारदर्शिता नहीं है, तो कोई न्यूनतम स्तर को छू पाने में नाकाम है। आरक्षण को भी उच्च शिक्षा की बिगड़ती दशा के लिए जिम्मेदार माना जाए, तो गलत नहीं होगा।


उच्च शिक्षा को संचालित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग है, जिसने 12 ऐसे स्वायत्तशासी संस्थान खड़े किए हैं, जो उच्च शिक्षा पर नजर रखते हैं। देश में अब तक 42 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 275 राज्य विश्वविद्यालय, 130 डीम्ड विश्वविद्यालय, 90 निजी विश्वविद्यालय, पांच राज्य स्तरीय संस्थान और 33 राष्ट्रीय महत्व के संस्थान कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा सरकारी डिगरी कॉलेजों की संख्या भी 16 हजार पहुंच चुकी है, जिसमें निजी डिगरी कॉलेजों के अलावा 1,800 महिला कॉलेज शामिल हैं। दूरस्थ और मुक्त विश्वविद्यालयों ने भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई क्रांति का सूत्रपात किया है। इसे संचालित करने के लिए दूरस्थ शिक्षा परिषद् है तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के पूरी दुनिया में 35 लाख से अधिक छात्र हैं। कुछ को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में मुक्त विश्वविद्यालय भी चल रहे हैं। लेकिन इन सबसे इतर शैक्षिक मापदंडों का केवल छिछले तरीके से ही पालन किया जा रहा है।

खासकर उत्तर भारत पर नजर डालें, तो यहां उच्च शिक्षा की वह गति नहीं बन पाई, जो वास्तव में होनी चाहिए। इसे सुधारने-संवारने के लिए बनाई गई दर्जनों कमेटियों की रिपोर्टें धूल फांक रही हैं। इन्हें लागू कराने में किसी सरकार की दिलचस्पी नहीं दिखती। हां, निजी विश्वविद्यालय खोलकर उच्च शिक्षा में पलीता लगाने का काम सरकारें जरूर कर रही हैं। चमक-दमक वाले इन संस्थानों पर लक्ष्मी तो खूब बरस रही है, पर सरस्वती की सेहत बिगड़ रही है। इन संस्थानों ने उच्च शिक्षा में एक नई फांस गले में डाल दी है, जो न निगलते बन रही है, न ही उगलते।

फैकल्टी का चयन भी एक बड़ा मसला है। बीते दिनों लखनऊ के एक आरटीआई कार्यकर्ता की अरजी से यह तसवीर साफ हुई कि देश के 24 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के आधे से जे्यादा पद रिक्त हैं। पता यह चला कि भरती के दौरान उच्च मानकों पर अभ्यर्थी खरे ही नहीं उतरे। विषय विशेषज्ञ के तौर पर मंजे अभ्यर्थियों का साक्षात्कार में न आ पाने के कारण भी समस्या लगातार गहराती जा रही है। अभी तक उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में 50 फीसदी से कुछ ज्यादा प्रोफेसर, रीडर (एशोसिएट प्रोफेसर) और असिस्टेंट प्रोफेसर के पद रिक्त हैं।

हिंदीभाषी राज्यों में उत्तर प्रदेश और बिहार को जहां कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों का तोहफा मिला, वहीं उत्तराखंड को अभी यह सम्मान नहीं मिल पाया है। केवल गढ़वाल विश्वविद्यालय के भरोसे पर ही पूरा राज्य टिका है। आईआईटी, रूड़की की अपनी साख है, लेकिन वह पहाड़ में न होकर मैदान में है तथा तकनीकी शिक्षा का अहम केंद्र है। जाहिर है, उत्तर भारत के इन राज्यों में उच्च शिक्षा के हालात पर मंथन कर बुनियादी ढांचे को और मजबूत करना होगा, नहीं तो लगातार कामचलाऊ शिक्षा देकर हम 'बेरोजगारों की फौज' खड़ी करते जाएंगे और सरकारों को बेरोजगारी भत्ता बांटने का मौका देते रहेंगे।

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