लुप्तप्राय सैमर भाषा

Vinit Narain Updated Thu, 19 Jul 2012 12:00 PM IST
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मैसूर स्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान ने अपने 44वें स्थापना दिवस के अवसर पर एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग सुकुरथंग सैमर को सम्मानित किया है, जो सैमर नामक लुप्तप्राय जनजातीय भाषा का सबसे बुजुर्ग जानकार है। दुनिया भर में मात्र चार लोग सैमर भाषा बोलते हैं।
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सैमर भाषी लोग त्रिपुरा के गंटाचेरा गांव के हालम जनजाति के 18 समूहों में एक सैमर समूह से संबद्ध हैं। त्रिपुरा में करीब 50 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें से 18 हालम जनजाति की विभिन्न शाखाओं में बोली जाती हैं। हालम जनजाति की हर शाखा में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। वर्ष 2009 में करीब 25 लोग ऐसे थे, जो सैमर भाषा बोलते थे, लेकिन अभी सुकुरथंग, उनकी पत्नी, उनका पोता और एक अन्य बुजुर्ग महिला ही इस भाषा को बोल पाती हैं। यह भाषा जानने वाले लोग रोजगार की तलाश में बाहर चले गए और अपनी भाषा भूल गए। इसके अलावा कहा जाता है कि इस समुदाय की हर पीढ़ी में मात्र एक बच्चा ही पैदा होता है और लड़कियां पैदा नहीं होतीं। इस कारण उनकी शादी दूसरे समुदाय में करनी पड़ती है और इस तरह अपनी भाषा छूटती जाती है।
सैमर जनजाति समूह की खोज भाषा मंदाकिनी नामक एक सर्वेक्षण के दौरान एक वर्ष पहले हुई है। काकबराक साहित्य सभा के अध्यक्ष नंदकुमार देव बर्मन, जो उस सर्वे से जुड़े थे, सुकुरथंग को उनके गांव से मैसूर लाए थे। इस भाषा को जानने वाले लोग कृषि मजदूर हैं। सैमर भाषा बोलना काफी कठिन है, क्योंकि इसके कुछ शब्द इतने जटिल हैं कि उसके उच्चारण में परेशानी होती है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान इन चारों सैमर भाषी लोगों से अनुवाद के जरिये सैमर भाषा के बारे में जानकारियां इकट्ठा करने का काम कर रहा है।
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