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विकसित समाज का कुरूप चेहरा

Vinit Narain Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
Woman Society Narrow mindset Guwahati
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देश के जिन इलाकों को महिलाओं की बेहतर सामाजिक स्थिति के लिए जाना जाता है, वहां भी स्त्रियां आज भीड़ के निशाने पर हैं। इसलिए पश्चिम बंगाल के स्कूलों में छात्राओं के कपड़े उतरवाने का मामला और गुवाहाटी की सड़क पर लड़की को पीटने-घसीटने और कपड़े फाड़ने का प्रसंग ज्यादा चौंकाता है।
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विचार करने की जरूरत है कि अपेक्षाकृत सजग समाज में इस तरह की संकीर्ण मानसिकता कैसे पनप रही है। घर-परिवार से शुरू होने वाली बुनियादी शिक्षा इतने गलत रास्ते पर कैसे ले जा रही है? क्या परवरिश में कोई दोष रह रहा है या स्कूली शिक्षा दोषपूर्ण है? जो समाज बसों-ट्रेनों में खुद पहल करके महिलाओं को बैठने की सीट देता है, वह समाज इतना स्त्री-विरोधी कैसे हो गया कि औरतों के अपमान पर भी चुप रहा! इससे पहले भी यह देश असम में ही एक महिला विधायक की बीच सड़क पर सामूहिक पिटाई देख चुका है। हालात में इस बदलाव के लिए कौन जिम्मेदार है?

दरअसल, समाज के इस रूप के पीछे परवरिश और शिक्षा, दोनों का ही दोष दिखता है। शिक्षकों के पास इतना वक्त नहीं है कि वे बाल मनोविज्ञान को समझें। नतीजा यह है कि उनकी झिड़कियों और उलाहनाओं के बीच बड़ा हो रहा औसत बुद्धि का छात्र कुंठित हो रहा है। शिक्षा उसे पहाड़ की तरह लगती है। सामान्य तौर पर गुरु-शिष्य के रिश्ते की खाई इतनी गहरी होती गई है कि बच्चा दूसरे तमाम रिश्तों की उष्णता से भी दूर होता जाता है। उसकी संवेदनाएं कुंद होती जाती हैं। चीजों को देखने-परखने की उसकी मानवीय दृष्टि मशीनी होती जाती है। संवेदनाओं से कुंद, पर समीकरणों से लैस। स्कूल में रोपा गया अंकगणित उसे अर्थगणित से तो जोड़ देता है पर रिश्तों के समीकरण में वह फिसड्डी रह जाता है।

गौर करें, गुवाहाटी में भीड़ की शिकार बनी लड़की अपने साथी के जन्मदिन में शामिल होकर लौट रही थी। हादसे के वक्त उसके कुछ साथी भी उसके साथ थे। पर बदसुलूकी के दौरान सब के सब उसे उसके हाल पर छोड़कर या तो भाग गए या दुबक गए। क्या थी असलियत, अभी तक उन्होंने न तो कुबूली है और न ही किसी रूप में यह बात सामने आई है। पर यह तय है कि उन्होंने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। पश्चिम बंगाल में तो हाल में महिलाओं के खिलाफ ऐसे कई मामले सामने आए हैं। सिर्फ किसी की शिकायत पर पदक विजेता एक महिला खिलाड़ी के हाथ-पांव बांधकर उसका मेडिकल परीक्षण कराया जाता है और कहीं से कोई आवाज नहीं उठती। इस तरह की चुप्पी ही संवेदनाओं के मर जाने की घोषणा करती है।

इस समाज में हम स्त्री को थाती मानकर बढ़ने देते हैं। घर में ही उसे शोषण सहने की सीख दी जाती है। उसे स्त्रीयोचित तमाम गुण सिखाए जाते हैं। उसे बताया जाता है कि तेज दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलटकर सवाल करना स्त्रीयोचित नहीं होता। यानी, हर कदम पर एक नए स्त्रीयोचित गुण से उसके व्यक्तित्व को निखारा जाता है। इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बनती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तानकर कहता है, देखो, उसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है।

दूसरी तरफ, घर का लाडला अपनी बहन को मिल रही सीख से सीखता है कि जितनी बंदिशें हैं, वह तो स्त्री के लिए हैं। हम तो आजाद परिंदे हैं। घर में ही उसे मर्द होने का एहसास कराया जाता है कमजोर बनाई जा रही बहन से सेवा करा कर। यह आदर्श स्थिति नहीं है। आदर्श स्थिति तो तब होगी, जब यह समाज अपनी बेटियों को भयमुक्त होकर जीने का प्रशिक्षण देगा। अपनी संकीर्ण मानसिकता से उबर कर जब तक यह समाज स्त्री के लिए अपनाए जा रहे दोहरे मानदंड को दूर नहीं करेगा, इस तरह के अपराध होते रहेंगे। फिर चाहे जितना जी चाहे हम पुलिस को कोस लें या पुलिस चाहे जितने अपराधियों को पकड़ कर जेल में ठूंस दे, यह जहरीली हवा हमें खुलकर सांस लेने नहीं देगी। जब उत्तर भारत पहले ही स्त्री-विरोधी फतवे जारी करने में लगा हुआ है, तब पूरब और पूर्वोत्तर की ये घटनाएं हताश करती हैं।

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