प्रभाष जोशी के दो अधूरे काम

Vinit Narain Updated Sat, 14 Jul 2012 12:00 PM IST
Prabhash Joshi
प्रभाष जोशी आज जीवित होते, तो पचहत्तर बरस के होते। इस मौके पर उन्हें नाना रूपों में याद किया जा सकता है। वह गांधीवादी-सर्वोदयी कार्यकर्ता थे, प्रखर अभियानी पत्रकार थे, भारतीय संस्कृति-परंपरा के गहन अध्येता व प्रामाणिक भाष्यकार थे, सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध चिंतक थे, परले दरजे के क्रिकेट दीवाने थे और इस सबसे ऊपर विशाल हिंदी समाज को जोड़ने वाली मजबूत कड़ी थे। पांच नवंबर, 2009 को जब दिल का दौरा उनका काल बन कर आया, उसके एक दिन पहले ही वह वाराणसी-लखनऊ के थकाऊ दौरे से लौटे थे और अगले सप्ताह पूर्वोतर के दौरे पर निकलने की तैयारी में जुटे थे।

प्रभाष जोशी वैसे तो ताउम्र एक साथ कई तरह के काम अपने हाथ में लिए रहे, लेकिन अपने अंतिम वर्षों में उन्होंने जिन दो बड़े कामों का बीड़ा अपने कंधों पर उठा रखा था, उनसे उनकी वैचारिक निष्ठा और प्रतिबद्धता को काफी हद तक समझा जा सकता है। ये काम थे-पहला, महात्मा गांधी की पुस्तक, हिंद स्वराज में वैश्वीकरण की काट तलाशना और दूसरा, भारतीय मीडिया में पेड न्यूज की बढ़ती बीमारी के खिलाफ व्यापक अभियान चलाना। उनके अचानक अवसान से ये काम अधूरे रह गए हैं।

वर्ष 1909 में लिखी गई हिंद स्वराज गांधी के विचारों का बीज ग्रंथ है। राष्ट्रपिता के बाद के तमाम लेख और विचार एक तरह से हिंद स्वराज का विस्तार ही हैं। प्रभाष जोशी का शिद्दत से मानना था कि वैश्वीकरण और बाजारवाद के मौजूदा दौर में हिंद स्वराज ही हमें सही रास्ता दिखा सकती है। वह हिंद स्वराज के शताब्दी वर्ष में इसका प्रचार-प्रसार करने में जुटे थे और नए संदर्भों में इसकी बड़ी व्याख्या लिखने की तैयारी भी कर रहे थे। उनका मानना था कि महात्मा गांधी ने जब हिंद स्वराज लिखी थी, तब वह भी वैश्वीकरण की समस्या से उसी तरह दो-चार हो रहे थे जैसा कि हम आज हो रहे हैं। दीगर है कि तब और आज के वैश्वीकरण में थोड़ा अंतर है।

गांधी के दौर में यूरोपीय देश दुनिया भर में अपने उपनिवेशों का विस्तार कर रहे थे और उनके संसाधनों का दोहन कर औद्योगिक क्रांति का परचम फहरा रहे थे। उस दौर के वैश्वीकरण की नकेल यूरोपीय देशों की राजसत्ताओं के हाथ में थी। मौजूदा वैश्वीकरण बाजार के विस्तार की शक्ल में है। आज किसी देश के संसाधनों के दोहन के लिए उसे उपनिवेश नहीं बनाना पड़ता है, बल्कि वहां के बाजार पर कब्जा करना होता है। प्रभाष जोशी का मानना था कि पश्चिम के तर्ज पर विकास की होड़ हमें कहीं का भी नहीं छोड़ेगी। वह चाहते थे कि देश की नई पीढ़ी में हिंद स्वराज का प्रचार-प्रसार हो। उनके अचानक अवसान से यह योजना धरी रह गई।

पिछले दो दशकों में भारतीय मीडिया के एक वर्ग में पेड न्यूज की बीमारी ने गहराई से पैठ कर ली है। प्रभाष जोशी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने वाले पहले बड़े पत्रकार थे। उन्हीं के आग्रह पर भारतीय प्रेस परिषद ने इस मुद्दे की जांच-पड़ताल की और इसे रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने की वकालत की। हाल के चुनावों में पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग ने जो तंत्र विकसित किया, उसका काफी कुछ श्रेय प्रभाष जोशी को जाता है। यह उनका ही अभियान था कि मीडिया का बड़ा वर्ग अब पेड न्यूज से परहेज करने लगा है और पाठक भी इसको लेकर जागरूक हो गए हैं। लेकिन पेड न्यूज की बीमारी के जो नाना रूप विकसित हो गए हैं, उन्हें देखते हुए उसका जड़ से दूर होना प्रायः असंभव हो गया है। आज प्रभाष जोशी जीवित होते, तो इस पर काबू पाने के लिए प्रभावी तंत्र बनाने की लड़ाई को मुकाम पर पहुंचाने की जद्दोजहद में मशगूल होते।

प्रभाष जोशी की 75वी वर्षगांठ पर उनके प्रिय काम बरबस याद आते हैं। दीगर है कि उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाने और मुकाम तक पहुंचाने के रास्ते दूर-दूर तक नजर नहीं आते। काश, इन रास्तों पर बढ़ने के लिए कोई चिराग कहीं तो रोशन होता।

Spotlight

Most Read

Opinion

सुशासन में नागरिक समाज की भूमिका

सुशासन को अमल में लाने के लिए नागरिक समाज का अहम स्थान है, क्योंकि यही समाज की क्षमता में वृद्धि करते हैं और उसे जागरूक बनाते हैं। यही सरकार या राज्य को आगाह करते हैं कि कैसे नागरिकों की भागीदारी से उनका संपूर्ण विकास किया जाए।

20 जनवरी 2018

Related Videos

VIDEO: ये है गरीबी में जीने वाला दुनिया का सबसे सुखी परिवार! देखिए कैसे

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में एक दंपत्ति डांस कर रहा हैं वो भी खूब मस्ती में।

20 जनवरी 2018

आज का मुद्दा
View more polls
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper