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हाशिये की आवाज की अनदेखी

Vinit Narain Updated Wed, 04 Jul 2012 12:00 PM IST
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फरवरी, 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने रेडियो से जुड़ा एक मील का पत्थर फैसला दिया था कि ध्वनि तरंगें सार्वजनिक संपत्ति हैं। इससे रेडियो के बहुआयामी विकास का रास्ता खुला, पर इस बदलाव में वह सामाजिक क्षेत्र पीछे छूट गया, जहां भारत बसता है। अपने रेडियो का सपना देखने वाले ग्रामीण क्षेत्र की आवाज सुनने में किसी को दिलचस्पी न रही।
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बदलाव की इसी प्रक्रिया में कम्युनिटी या सामुदायिक रेडियो का जन्म हुआ, जो अपने प्रसारण से भौगोलिक और समान अभिरुचि के श्रोताओं की सेवा करते हैं। वे ऐसी सामग्री का प्रसारण करते हैं, जो स्थानीय/विशिष्ट श्रोताओं में लोकप्रिय है, जिनकी अनदेखी वाणिज्यिक या जन-माध्यम प्रसारकों द्वारा की जाती है। इसका संचालन सामुदायिक स्तर पर होता है, जो लाभ कमाने के लिए नहीं होता। सामुदायिक रेडियो व्यक्ति विशेष, समूह और समुदायों की अपनी विविध कहानियों को कहने और अनुभवों को बांटने की प्रक्रिया को सुगम बनाते हैं।

इससे पूर्व रेडियो दो तरह की प्रसारण भूमिका में था। एक में रेडियो की भूमिका व्यावसायिक थी और दूसरे में वह जन प्रसारक की भूमिका निभा रहा था। सामुदायिक रेडियो उन श्रोताओं को एक विकल्प देता है, जो संख्या के हिसाब से रेडियो प्रसारकों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है या बाजार के नजरिये से जिनका कोई महत्त्व नहीं है। सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की शक्ति वाले ट्रांसमीटर की सहायता से पांच से पंद्रह किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र की पहुंच वाले छोटे रेडियो स्टेशन हैं, जो एफ एम बैंड पर प्रसारण करते हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा इनके व्यापारिक उपयोग पर रोक है। इन स्टेशनों को कॉमर्शियल एफ एम की तरह कारोबार करने की छूट नहीं है।

सामुदायिक रेडियो की स्थापना का मुख्य मकसद मनोरंजन करना न होकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य करना है। ये सीमित संख्या में ही विज्ञापन ले सकते हैं। आज देश में सामुदायिक रेडियो की कुल संख्या मात्र 126 है। देश की जनसंख्या, आकार और विभिन्न भाषाओं और संस्कृति के हिसाब से यह संख्या नाकाफी है। हमारे दो छोटे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका सामुदायिक रेडियो के मामले में हमसे बेहतर स्थिति में हैं।

संभावनाओं के लिहाज से सरकार ने इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया है। अब तक यही माना जाता रहा है कि सामुदायिक रेडियो का जिम्मा उस समुदाय से संबंधित लोगों को ही संभालना होगा। सरकार इस संदर्भ में मात्र स्पेक्ट्रम शुल्क में ही कुछ छूट दे रही है। अभी हाल ही में सामुदायिक रेडियो की लाइसेंस फीस तीन गुना बढ़ाकर 91,000 करना, फिर इसे घटाना बताता है कि सरकार इसके विकास की सिर्फ बात ही करना चाहती है, काम नहीं।

सूचना-समाज के इस युग में देश में बढ़ते डिजिटल डिवाइड को कम करने में सामुदायिक रेडियो एक सशक्त माध्यम हो सकता है। लेकिन वंचितों के इस माध्यम को स्थापित करने में कोई सरकारी अनुदान या प्रोत्साहन नहीं दिया जात। यही कारण है कि सामुदायिक स्तर पर इसको चलाना आसान नहीं होता। सरकार लोगों को साक्षर करने के नाम पर तो करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन लोगों तक सूचना और ज्ञान का प्रसार करने के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में पहचाने जाने वाले इस माध्यम के विकास पर खर्च करना उसे मंजूर नहीं है।

जनप्रसारक आकाशवाणी भी अब विज्ञापन से होने वाली आय पर ध्यान केंद्रित करने लग गई है। ऐसे में सामुदायिक रेडियो चैनलों की संख्या कैसे बढ़े, यह यक्ष प्रश्न अब भी कायम है। बाजारवाद के इस दौर में जब कॉरपोरेट समूहों द्वारा समाज सेवा भी इसलिए की जाती है, ताकि उनकी ब्रांड इमेज सुधरे, तब यह उम्मीद करना बेकार है कि कोई व्यावसायिक समूह आगे आकर सिर्फ समाज सेवा के लिए लिए पैसे खर्च करेगा।

वस्तुस्थिति यह है कि कुछ रेडियो स्टेशनों को छोड़ दिया जाए, तो सामुदायिक रेडियो स्टेशन अपने रोजमर्रा का खर्च निकालने में भी असमर्थ हैं। वे चाहते हैं कि सरकार कम से कम उन्हें वार्षिक लाइसेंस शुल्क से मुक्त कर दे। क्या सरकार उनकी आवाज सुनने को तैयार है?

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