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आईएसआई की समानांतर सरकार

Vinit Narain Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
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अबू जुंदाल की गिरफ्तारी के साथ ही दुनिया के सामने साफ हो गया है कि मुंबई के 26/11 के हमले को पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों ने अंजाम दिया था। यह हकीकत है कि आईएसआई इतनी ताकतवर हो गई है कि वह अपने मुल्क में एक समानांतर सरकार चला रही है, जिसका भद्दा प्रदर्शन भारतीय कैदी सरबजीत सिंह की कथित रिहाई के वायदे से वहां की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के मुकरने से हो गया। किसी खुफिया एजेंसी का ऐसा दखल दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता।
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वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की भूमिका कुछ आंतरिक मामलों तक ही सीमित है। बाहरी मामलों में क्या नीति अपनानी है, क्या बयान देना है, यह सब वहां की सेना और आईएसआई ही तय करती है। इसका शर्मनाक उदाहरण कारगिल युद्ध था, जिसे सेना और आईएसआई ने मिलकर अंजाम दिया था। उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ चीन के दौरे पर थे और वह वहीं से तत्कालीन आईएसआई प्रमुख को निर्देश दे रहे थे कि उन्हें प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कितनी जानकारी देनी है या नहीं देनी है।

इन दोनों की टेलीफोन वार्ता का टेप बाद में दुनिया ने सुना था। अबू जुंदाल की गिरफ्तारी के बाद आईएसआई के लश्कर-ए-तैयबा से रिश्ते के बारे में भी नई रोशनी पड़ी है। कराची के कंट्रोल रूम से किस तरह 26 /11 के हमलावरों को निर्देश दिए जा रहे थे, इससे आईएसआई की गतिविधियों, उसके तौर-तरीकों के बारे में पता चलता है।

आईएसआई के अफगान ब्यूरो से जुड़े रहे पाकिस्तानी ब्रिगेडियर मुहम्मद यूसुफ ने अपनी किताब द बियर ट्रैप (अफगानिस्तान्स अनटोल्ड स्टोरी) में आईएसआई की कार्य पद्धति, नीतियां और उसके संचालन का पूरा ब्योरा दिया है। यूसुफ अभी लंदन में निर्वासित जिंदगी जी रहे हैं। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि आईएसआई द्वारा संचालित तालिबान मिशन अफगानिस्तान में रूसी सेना के विरुद्ध चलाया गया था। यह किताब बताती है कि आईएसआई किस तरह अपने दुश्मन देश को बरबाद करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

वास्तव में अपने निर्माण के समय से ही पाकिस्तान कभी एक राष्ट्र के रूप में व्यवहार नहीं कर सका। उसकी जोर जबर्दस्ती के कारण ही बांग्लादेश का उदय हुआ। हमारी मुश्किल यह है कि हमें इस पड़ोसी के साथ ही रहना है, जो बदलने को तैयार नहीं है। यह निर्विवाद है कि दुनिया में जहां कहीं भी सेना विवादों में पड़ी, वहां अस्थिरता और अशांति फैली। पाकिस्तान इसका अपवाद नहीं। कहने को वहां प्रजातंत्र है, परंतु असली सत्ता सेना के हाथ में है। हाल ही में उसे विश्व के नाकारा देशों की सूची में 15वां स्थान मिला है। यह एक देश के लिए शर्म की बात है और मानवता के लिए अभिशाप भी, क्योंकि हमारे पड़ोस में 20 करोड़ का मानव समूह कुशासन व नाकारा गणराज्य में आतंकवाद, अशिक्षा और गरीबी की यातना भोग रहा है।

इस समय पाकिस्तान के राजनीतिक हालात फिर से अस्थिरता की तरफ बढ़ रहे हैं। जब भी वहां की सेना अपने देशवासियों का ध्यान देश की गतिविधियों से हटाना चाहती है, तभी वह भारत से कोई विवाद या छोटा-मोटा युद्ध छेड़ देती है। वर्ष 2008 में मुंबई में हुआ हमला ऐसी ही कार्रवाई थी।

यह हकीकत है कि आज कोई भी देश लंबी अवधि तक युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, एक सप्ताह भी कोई पूर्णकालिक युद्ध चले, तो उसका खर्च हमारी एक पंचवर्षीय योजना पर होने वाले खर्च के बराबर होगा। ऐसे में पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली का सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह भी स्पष्ट है कि अब कहीं पुराने जमाने वाली लड़ाई नहीं होगी।

इसका कारण है कि अब कई देश परमाणु शक्ति संपन्न हो गए हैं तथा यह आशंका है कि यदि हारने वाले देश ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर दिया, तो मानव जीवन का तो महाविनाश होगा ही, उस भू-भाग पर लंबे समय तक मानव का रहन-सहन भी नहीं हो सकता। इसलिए भारत, पाकिस्तान और चीन कभी भी सीमाओं पर पूर्ण युद्ध नहीं लड़ेंगे और केवल आतंकवाद या छापामार लड़ाई ही चलती रहेगी। अपनी रणनीति बनाते समय हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए।

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