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बाजार के हवाले चिकित्सा शिक्षा

Vinit Narain Updated Sun, 01 Jul 2012 12:00 PM IST
medical education  in hand of  Market
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भारतीय चिकित्सा परिषद् ने चिकित्सा शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को चिंताजनक बताते हुए कुछ महीने पहले कहा था कि निजी मेडिकल कॉलेज पैसा कमाने की मशीन बन गए हैं। निजी क्षेत्रों की पैठ से चिकित्सा महाविद्यालयों की संख्या तो बढ़ी है, पर गुणवत्ता में गिरावट आई है। वर्ष 1995 में देश में 150 चिकित्सा शिक्षण संस्थान थे, जो बढ़कर 335 हो गए हैं। इनमें एमबीबीएस की 40,525 सीटें स्वीकृत हैं। आगामी सत्र से देश में लगभग 400 मेडिकल कॉलेज और 45,000 सीटें हो जाएंगी।
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इनमें से दो-तिहाई सीटें निजी मेडिकल कॉलेजों के हिस्से में होंगी, जहां की फीस अमीर ही भर सकते हैं। चिकित्सा की ऐसी पढ़ाई से सर्वाधिक नुकसान गरीब मरीजों का हो रहा है। निजी मेडिकल कॉलेज खोलने का मकसद गरीबों को चिकित्सा उपलब्ध कराने के बजाय नव उदारवादी नीतियों को जामा पहनाते हुए देश के धनाढ्यों को लाभ पहुंचाना तथा सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से चिकित्सा क्षेत्र में घुसे चले आ रहे गरीब बच्चों को बाहर रखने का कुचक्र रचना है।

दक्षिण भारत को छोड़ देश के अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेजों के संकायों में नियमित प्राध्यापक नहीं हैं। पठन-पाठन की खानापूर्ति स्नातकोत्तर छात्रों से कर ली जाती है। देश के केवल 10 प्रतिशत चिकित्सा महाविद्यालयों के सभी विभाग पूर्ण हैं। पहले निजी मेडिकल कॉलेज की 50 प्रतिशत सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से भरी जाती थीं और बाकी पचास प्रतिशत मैनेजमेंट कोटे की होती थीं। कैपिटेशन फीस न लेने के निर्देश के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने निजी मेडिकल कॉलेजों को अपने स्तर से प्रवेश परीक्षा लेने की छूट दे दी। अब ये निजी मेडिकल कॉलेज उसकी आड़ में दिखाने मात्र को प्रवेश परीक्षा लेते हैं। चयन उन्हीं का होता है, जो पिछले दरवाजे से प्रबंधकों को मोटी रकम देते हैं।

उत्तर प्रदेश में 20 से 30 लाख और चेन्नई में 25 से 45 लाख कैपिटेशन फीस ली जा रही है। चेन्नई में केवल प्रवेश फॉर्म की कीमत ही 25,000 रुपये है। कैपिटेशन फीस के अलावा सालाना फीस पांच से साढ़े सात लाख है। प्रवासी सीटों के लिए विकास शुल्क के नाम पर 25 से 35 लाख वसूले जा रहे हैं। विगत अप्रैल में महाराष्ट्र विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता ने बताया कि प्रवेश परीक्षा पास करने वाले छात्रों से निजी मेडिकल कॉलेज प्रबंधक स्नातक शिक्षा के लिए 20-25 लाख और स्नातकोत्तर के लिए 50 से 75 लाख अनुदान ले रहे हैं। जहां सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सालाना 30,000 फीस में पढ़ाई हो जाती हो, वहीं निजी मेडिकल कालेजों में साढ़े चार से साढ़े सात लाख फीस देने के बावजूद कैपिटेशन फीस से मुक्ति नहीं मिल पा रही।

जनपक्षधरता के बुनियादी सरोकार में गुणात्मक शिक्षा और चिकित्सा का पहला स्थान होता है, पर वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेवाएं बोझ समान हैं और मुनाफे का सिद्धांत ही सर्वोपरि है। इसी कारण दायित्वों से हाथ खींचकर सरकार ने चिकित्सा शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया है। आज सरकारी मेडिकल कॉलेजों में संविदा पर तैनात अयोग्य डाक्टर आ रहे हैं। एम्स तक में वरिष्ठ डॉक्टरों के रिक्त पदों पर संविदा पर नियुक्तियां की जा रही हैं। सरकार का विचार है कि अब मात्र 10 एकड़ जमीन पर भी चिकित्सा महाविद्यालय खोलने की अनुमति दी जानी चाहिए, जिससे सालाना 45,000 एमबीबीएस और 20,000 स्नातकोत्तर उपाधियां बढ़ाई जा सकें।

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा जैसे राज्यों में चिकित्सा महाविद्यालयों की बेशक कमी है। दक्षिण भारत में जहां 15 से 19 लाख की आबादी पर एक मेडिकल कॉलेज है, वहीं बिहार में 115 लाख, उत्तर प्रदेश में 95 लाख, मध्य प्रदेश में 73 लाख और राजस्थान में 68 लाख की आबादी पर एक कॉलेज है। लेकिन उपाधियों की संख्या बढ़ाने के साथ योग्य डॉक्टर पैदा करना भी जरूरी है। कुकुरमुत्तों की तरह निजी मेडिकल कॉलेज खोलने और उन्हें कमाने की छूट देने से चिकित्सा शिक्षा का स्वरूप अमानवीय बन जाएगा।

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