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साहित्य के गांधी की याद

Vinit Narain Updated Fri, 22 Jun 2012 12:00 PM IST
the memory of Literature Gandhi
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आज विष्णु प्रभाकर की जन्मशताब्दी है। उन्हें याद करना इसलिए भी जरूरी है कि वह हिंदी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जो गांधीवादी होते हुए भी प्रगतिशील मूल्यों के मामले में कई वामपंथी रचनाकारों से भी हमेशा आगे रहे। उनके जीवन में संकीर्णता, जातीयता, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता के लिए कोई जगह नहीं थी। तमाम उम्र स्वतंत्र लेखन से जीविका चलाने वाले विष्णु जी ने कभी किसी की चाटुकारिता नहीं की और सत्ता से हमेशा दूरी बनाए रखी।
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उनकी लेखकीय ईमानदारी का सुबूत उनकी बहुचर्चित किताब आवारा मसीहा है, जो उन्होंने अपने सबसे प्रिय लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय पर लिखी। यह किताब लिखने के लिए उन्होंने न केवल बांग्ला सीखी, बल्कि उन तमाम जगहों पर गए, जहां कभी शरत रहे या गए थे। बिना किसी सांस्थानिक सहयोग के उन्होंने अपने बूते पर म्यांमार तक की यात्रा की। व्यापक अध्ययन और शोध के बाद उन्होंने 14 वर्षों में वह किताब पूरी की। आवारा मसीहा हिंदी की बहुचर्चित तीन जीवनियों में से एक है, लेकिन यह कई मायनों में सबसे अलग है। यह एकमात्र ऐसी जीवनी है, जो किसी भी तरह की क्षेत्रीयता और पारिवारिक संबंधों के दबाव से मुक्त है।

विष्णु जी न तो कभी साहित्य की राजनीति में रहे और न ही कभी सत्ता के लोगों के निकट। वह सदा हाशिये पर रहे। अकसर वह साहित्यिक गुटबाजी का शिकार होते थे, लेकिन उनको लेकर वह कभी कटु नहीं हुए। उन्हें जो भी पुरस्कार मिले, वह देर से मिले और तब मिले, जब उसका कोई तिकड़मी दावेदार मैदान में नहीं था। उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार भी आवारा मसीहा के प्रकाशन के बीस वर्षों बाद अर्द्धनारीश्वर के लिए दिया गया। और पद्म विभूषण से 92 वर्ष की उम्र में नवाजा गया, जबकि उनसे पहले साहित्य के लिए ही शिवानी, सुरेंद्र शर्मा और के पी सक्सेना तक को पद्मश्री दी जा चुकी थी।

विष्णुजी के साथ कॉफी हाउस में मेरा लगभग तीस वर्षों का साथ रहा, इसलिए उनसे एक अनौपचारिक रिश्ता-सा बन गया था। कॉफी हाउस में उनके साथ न केवल साहित्य और राजनीति की बातें होती थीं, बल्कि नितांत पारिवारिक बातें भी होती थीं। कई बार अपनी दिवंगत पत्नी को याद कर उनकी आंखें गीली हो जाती थीं। हालांकि उनके बच्चों ने बुढ़ापे में उनका काफी खयाल रखा, लेकिन वस्तुतः पत्नी के गुजर जाने के बाद वह बिलकुल अकेले हो गए थे। कॉफी हाउस में उनसे कोई भी मिल सकता था और वह सबसे बराबरी के स्तर पर बात करते थे। सबकी सुनते और सबको अपनी बात बतलाते थे। जीविका के लिए लेखन पर ही पूरी तरह निर्भर रहने के बावजूद वह अकसर लोगों की मदद करते थे।

विष्णु जी कई मायनों में आज के लेखकों के लिए आदर्श और अनुकरणीय थे। वर्ष 1991 में हमने इराक पर अमेरिकी हमले के खिलाफ एक अंगरेजी दैनिक में विज्ञापन देने का फैसला किया, इसमें अंशदान करने वालों में सबसे पहले व्यक्ति विष्णु जी ही थे। वह साहित्य अकादेमी की सामान्य परिषद् के सदस्य और हिंदी के समन्वयक भी रहे, लेकिन उस दौरान उन्होंने न तो कोई विदेश यात्रा की और न ही अकादेमी से किसी तरह का लाभ ही लिया। शरतचंद्र की तरह उनके लेखन में भी भावुकता और आदर्शवादिता देखी जा सकती है। वह स्त्रियों के दमन और शोषण के विरोधी एवं समानता के समर्थक थे। अकारण नहीं है कि उनके नारी पात्र पुरुषों की तुलना में ज्यादा उदात्त, मानवीय, गरिमामय और त्यागमय नजर आते हैं।

विष्णु जी का परिवार पारंपरिक रूप से आर्य समाजी था, लेकिन व्यावहारिक जीवन में वह इतने प्रगतिशील थे कि अकसर फक्र से बताते थे कि उनके परिवार की शादियां विभिन्न जातियों और प्रांतों में हुई हैं। अपने जीवन में वह सरलता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे। शराब, सिगरेट को कभी हाथ नहीं लगाया और बेहद संयमित एवं शालीन जीवन जिया। यही वजह रही कि उन्होंने काफी लंबी जिंदगी जी। उन्हें याद करना उन मूल्यों को याद करना है, जो आज हमारे जीवन से तिरोहित होते जा रहे हैं।

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