आनंद कारज विवाह अधिनियम

Vinit Narain Updated Tue, 12 Jun 2012 12:00 PM IST
संसद के बजट सत्र के दौरान सिख संप्रदाय के लोगों की शादी के लिए बने आनंद कारज विवाह अधिनियम, 1909 में संशोधन पारित किया गया था, जिसे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी मंजूरी दे दी। इसलिए अब सिख संप्रदाय के लोगों की शादी का पंजीकरण हिंदू विवाह अधिनियम के तहत न होकर आनंद कारज विवाह अधिनियम, 2012 के तहत होगा।

इनके विवाह के लिए अधिनियम तो वर्ष 1909 में ही बना था, लेकिन उसमें विवाह के पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं था। स्वतंत्रता से पहले सिखों में शादियां गुरु ग्रंथ साहिब की मौजूदगी में आनंद विवाह अधिनियम के तहत होती थीं और 1955 तक ऐसा होता रहा। लेकिन 1955 में उसे निरस्त कर दिया गया और चार समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म) को जोड़ते हुए सिखों को भी हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल कर लिया गया।

गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और कई अन्य सिख संगठन लंबे समय से आनंद कारज के तहत होने वाली सिखों की शादियों को हिंदुओं से अलग मान्यता दिए जाने की मांग कर रहे थे। इसकी कई वजहें थीं। पहला तो यही कि सिख और हिंदू धर्म की शादियों के रीति-रिवाजों में अंतर है।

हिंदुओं में जहां शादी के समय सात फेरे लिए जाते हैं, वहीं सिखों में उससे कम फेरे लिए जाते हैं। इसके अलावा, सिख संप्रदाय के जो लोग विदेश जाते हैं, उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत दिए गए विवाह प्रमाणपत्र को लेकर कई समस्याएं होती हैं। मसलन, उनके पासपोर्ट पर सिख लिखा होता है, जबकि विवाह प्रमाणपत्र हिंदू धर्म का होता है। सिख संप्रदाय के संतों में सहमति नहीं बन पाने के कारण इस नए अधिनियम में तलाक का प्रावधान अभी नहीं रखा गया है।

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