एक तिहाई आबादी का दुख

Vinit Narain Updated Sun, 10 Jun 2012 12:00 PM IST
One third of population suffering
ख़बर सुनें
जो खबर जीवन से सीधी जुड़ी होती है, कई बार वही अचर्चित रह जाती है। अमेरिकी संस्था गैलप द्वारा भारत में दुखी महसूस करने वालों की संख्या संबंधी सर्वेक्षण के साथ यही हुआ। इस सर्वेक्षण के मुताबिक, 31 प्रतिशत से ज्यादा यानी करीब एक तिहाई भारत की आबादी दुखी है। दुःख, अवसाद, सुख, उल्लास-ये सब अंतर्मन की अवस्थाएं हैं, पर ये उत्पन्न होतीं हैं बाहरी परिस्थितियों के कारण। जाहिर है कि एक बड़े वर्ग के लिए बाहरी परिस्थितियां या समाज का सामूहिक व्यवहार ऐसा नहीं है, जिसमें वह खुश रह सके।
यह देश इस समय जिस दशा से गुजर रहा है, वह भविष्य के लिए चिंताजनक है। सर्वेक्षण के मुताबिक, किसान और कृषि मजदूरों में दुखी रहने वालों की आबादी सर्वाधिक 38 प्रतिशत है। जबकि पिछले वर्ष इस वर्ग में दुखी रहने वालों की आबादी 31 प्रतिशत थी। सबसे कम करीब 0.6 प्रतिशत दुखी आबादी प्रोफेशनल डिग्रीधारियों की है। हालांकि रोजगाररत आबादी के ज्यादातर तबके में दुखी होने वालों का अनुपात पिछले वर्ष से बढ़ा है, लेकिन यह वृद्धि उतनी नहीं है, जितनी कृषि क्षेत्र में। इसका सीधा निष्कर्ष यही है कि गांव और कृषि को ताकत देने के लिए जितना कुछ किया जाना चाहिए, उतना तो नहीं ही किया गया, दूसरे क्षेत्रों भी ऐसी स्थिति नहीं बन पाई, जिनसे वहां संतुष्ट होने लायक माहौल बन सके।

यह स्थिति अस्वाभाविक नहीं है। केंद्र या राज्यों की सरकारें चाहे जो दावे करें, विकास के वर्तमान ढांचे में वरीयता हमेशा उद्योग और शहर को ही मिलती है। गांव और कृषि हाशिये पर खिसकती जाती है। गांवों में आज वही रहना चाहता है, जिसके पास शहर में बसने का विकल्प नहीं है। कृषि पर भी वही निर्भर है, जिसके पास जीविकोपार्जन के दूसरे साधन उपलब्ध नहीं हैं।

सच कहा जाए, तो गांव एवं कृषि की आपराधिक उपेक्षा को देखते हुए आश्चर्य इस पर होना चाहिए कि दुखी होने वालों की संख्या केवल 38 प्रतिशत क्यों है! अब भी 62 प्रतिशत लोगों ने यदि स्वयं को दुखी नहीं बताया, तो यह भारतीय संस्कार में व्याप्त परंपरागत जिजीविषा और हमेशा बेहतर होने की उम्मीद वाले सामूहिक दृष्टिकोण का परिणाम है। निष्कर्ष साफ है कि अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद जिस देश की 65 प्रतिशत से ज्यादा आबादी अब भी गांवों में है और कुल रोजगार का करीब 60 प्रतिशत कृषि एवं उससे जुड़ी गतिविधियों में ही मिल रहा है, उसकी उपेक्षा खत्म होनी चाहिए। यह तभी होगा, जब गांवों एवं कृषि के अनुकूल माहौल बने। माहौल बनाने में उपयुक्त नीतियों, उनके ईमानदार क्रियान्वयन एवं नीति-निर्माता सहित आम प्रभावी वर्ग के व्यवहार की सम्मिलित भूमिका होती है। गांवों और शहरों तथा उद्योगों, आधुनिक कारोबारों एवं कृषि के बीच नीतिगत एवं व्यवहार के स्तर पर जो भेदभाव है, उसका अंत होना चाहिए।

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो दुखी तबके की संख्या और बढ़ेगी और इससे देश के सक्षम होने की संभावनाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी। शहरवासी एवं अन्य पेशे में लगे लोगों में भी दुखी होने वालों की संख्या बढ़ रही है। यह विकास की नीतियों से उत्पन्न इस असंतुलन की स्वाभाविक परिणति है। इसमें संघर्षरत लोगों की संख्या पिछले वर्ष के 66 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत बताई गई है। लेकिन अगर दुखी होने वालों की संख्या बढ़ी है, तो उसमें इस 10 प्रतिशत का भी हिस्सा शामिल है। यानी लोग जो काम कर रहे हैं, उसमें उनकी रुचि नहीं, वे मजबूरी में करते हैं।

अगर कृषि समुन्नत हो, उसे पुनः सम्मान का काम बना दिया जाए, किसानों और खेत मजदूरों का निर्वाह संतोषजनक ढंग से होने लगे, तो देश की बहुत सारी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्याओं पर विराम लग जाएगा। शिक्षा का स्तर भी दुख और सुख का निर्धारण करती है। जिसकी उच्च डिगरी, वह कम दुखी। लेकिन सब उच्च या प्रोफेशनल डिगरीधारी नहीं हो सकते और वे भी ज्यादा संख्या में हो जाएं, तो उनके लिए रोजगार की कमी पड़ जाएगी। इसलिए अपने समाज में बढ़ते दुख को कम करने का रास्ता शहरों और गांवों, कृषि और उद्योगों और अन्य कारोबारों के बीच असंतुलनों का अंत करने में ही है।

Spotlight

Most Read

Opinion

पेशावर की साझा विरासत

पहली बार एक पाकिस्तानी टीवी चैनल ने किसी सिख महिला को बतौर रिपोर्टर नियुक्त किया है, तो पख्तूनख्वा में सिखों ने मुस्लिमों के लिए इफ्तार का आयोजन कर धार्मिक सद्भाव की मिसाल कायम की।

24 मई 2018

Related Videos

यूपी एटीएस ने दबोचा ISI एजेंट समेत शाम की 5 बड़ी खबरें

अमर उजाला टीवी पर देश-दुनिया की राजनीति, खेल, क्राइम, सिनेमा, फैशन और धर्म से जुड़ी से जुड़ी खबरें। देखिए LIVE BULLETINS - सुबह 7 बजे, सुबह 9 बजे, 11 बजे, दोपहर 1 बजे, दोपहर 3 बजे, शाम 5 बजे और शाम 7 बजे।

24 मई 2018

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे कि कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स और सोशल मीडिया साइट्स के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं।आप कुकीज़ नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज़ हटा सकते हैं और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डेटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते है हमारी Cookies Policy और Privacy Policy के बारे में और पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

अमर उजाला ऐप चुनें

सबसे तेज अनुभव के लिए

क्लिक करें Add to Home Screen